दुविधा -रॉयल्टी ऑफ़ लव
By Pratiksha
एक सुसज्जित कमरे से आ रही थी वो ध्वनि,
रात्रि की जयोत्स्िा मे, ववयोग, िीमम्रता सी वो ध्वनि,
मध्य कमरे मे, सौंदयय उसका चमक रहा,
अश्कों से लिप्त, पूर्णयमा मे, चेहरा उसका दमक रहा।
आवाज़ मे थी ग़म की चादर, चीर दे िो सरुम्य मि,
बाहर से असहाय सी, अन्दर हो एक िख़्मी अप्रनतम ति।
अश्कों की बाररशें, कशक का बे – साहहि समुन्दर,
मर रही हर पि वो िैसे, वहसत के खिं र चुभ रहे अन्दर ही अन्दर।
था चेहरा बेिाि िैसे,चााँद पर छाया ग्रहण,
अवचेतिा, बेसुध सी वो, कर रही हो कुछ ्मरण।
तासीर हैप्रचंड वेदिा, टुटा है हदि पे असीम प्रिय,
खोया हुआ हैिभ कहीं, पथ्ृवी हुई है ववषमय।
चीख संग पुकार उसकी, गूंि रही थी हर हदशा,
मािो पिों मे बि गया, सरुम्य भोर, गहरी निशा।
क्या कहूाँ, मैक्या करू, ये कैसी िन्मी ववपदा,
छाया है मातम रूह पे, िो चंचि सी थी सदा।
प्रेम मे तो प्रीत पे, िाि कुबािय की रीती है,
फिर प्रीत मेरा िाि – ए – दश्ुमि, ये कैसी नियनत है।
कान्हा! तुम ही कहते सदा, प्रेम पर सब कुछ वार दो,
िो समक्ष वप्रयतम की मत्सृयु, उसके बदिे अपिा िााँ– निसार दो।
िो देख िो व्यथा मरेी, सब तो मैंिे कुबायि फकया,
एक प्रेमी से अधधक, मैंिे देवता सा सम्माि फकया।
प्रेम ही िीवि – मत्सृयु, प्रेम ही पुण्य – पाप है।
प्रेम से बहती िदी, प्रेम से हदि – रात है।
प्रेम से हर िीव – नििीव, प्रेम ही वरदाि है।
्वगय मे हैप्रेम पूिा, मत्सृयुिोक मे अलभशाप है।
त्रबि प्रेम के िीवि का, कहा तनिक भी मोि है,
प्रेम तो अमतृ की भानत, ये कान्हा के बोि है।
तो फिर कहो कान्हा, त्रबि प्रेम के क्या िाि है?
मै तो त्रबखरी श्ंखृ िा, मरेा शरीर मतृ समाि है।
िगी थी िो उससे िगि, उस प्रेम का था िा चरम,
उसे प्रेम हैमुझसे कहीं, ये मेरी आत्समा का था भरम,
िा रही क्षर्णक धचतं ा मुझ,े िा थी हृदय मे तनिक शरम,
बि रहुप्रेम हदवािी सदा, ये थी मरेी इच्छा प्रबि।
िपते -िपते प्रेम की मािा, हो गई मैगुमिाम।
िा रही खबर मुझ हदवािी को, हुई मैिग बदिाम।
अब िा प्रेम की इच्छा रही, िा प्रीत मेरे संग है,
िीि,े मरिे की अपार दवुवधा, मज््तष्क, हृदय के बीच िंग है।
अंत मे लिया ये निणयय, सम्पूणय देह िाश का,
आघात कर अंनतम क्षण, बढ़ा कदम वविाश का।
पर एक तेि तीश सी उठी, मेरे हृदय के कक्ष मे,
ज्ञात होता है की िैसे, धगररधर है खड़े प्रत्सयक्ष मे।
आाँखों मे मायािाि था, चेहरे पे थी मोहहत शरारत।
क्या बात है बोिो सखी? क्यों है भीगी अक्षु परत?
ये हाि क्यों बेिाि सा? िैसे आयी हो हररत मे ऋतूसरत।
िािते तो सब हो माधव! फिर क्यों िाि के अििाि हो?
हााँ, िािता हुं सब सखी! पर क्यों तुम यूं परेशाि हो?
अवगत तो हो तुम प्रेम से, की प्रेम एक द्वन्द है।
िहााँएक ओर शांनत है, वही दसू री ओर वेदिा,
एक ओर ववयोग है, वही ववपरीत प्रेम की संवेदिा
लमिि मधुर संगीत तो, ववयोग गंभीर राग है।
हसीं सुिहरे अल्िाज़ है, आाँशुप्रेम के ताज़ है।
हैअपूणयता, संपूणयता दोिों अखंड इस द्वन्द मे,
पूणय प्रेम अगर हमराज़ है, तो अपूणय भी सरताि है।।।
By Pratiksha

Comments