दुल्हन
By Pragati Ishwarchand Sahuji
आज फिर कोई दुल्हन शादी के जोड़ेमे आई होगी
अपनी हाथो पर उसने गहरी मेहंदी रचाई होगी
रोई तो बोहत होगी वो जब उसे याद बचपन की आई होगी
बाबुल का घर छोडकर अब वो पराई होगी
याद आता होगा उसे वो लम्हा जब पापा का हाथ पकड़ कर
वो पहली बार आंगन मे चलाई गई होगी
सपने सजाये होंगे उसने बचपन से शादी के जब उसने
मिट्टी की गुडिया बनाई होगी
उस मिट्टी की गुडिया को जब उसने दुल्हन सा सजाया होगा
घर मे सबको इक्कठा कर झूठ मूठ के आसू से उसकी बिदाई की होगी
एसे ही आंगन मे खेल कूद करते करते वो सयानी हुई होगी
माँ की चप्पल को अपने पैर मे डाल कर सारे मोहल्ले मे सैर कर आई होगी
माँ के जिस आचल के पीछे वो पापा की डाट से चुपती होगी
वो आचल आज वो खुद के कन्धे पे डाल इतराई होगी
बचपन मे जो चूडिया पहनने से इनकार करती थी,
अब उसिने माँ की चूडियों से कलाई खनखनाई होगी
पापा से प्यार करने वाली उनकी गुडिया गोदी मे खेलते खेलते अब उनके कन्धे की उचाई तक आयी होगी
कभी उसने नकल नकल मे पापा का चश्मा तो कभी
हाथो की घड़ी उठाई होगी
जब भी वो बचपन मे पापा के पेट पर जाकर सोती होगी
उसे सबसे सुकून की नींद आई होगी
पर गलती करने पर पापा की हर डाट पर वो चुप चुपके रोई भी होगी
खुश हो गई होगी वो जब बेटि होकर भी बेटे से प्यार को जताई होगी
यहा पर तो बेटी थी पर उस घर माँ की परछाई होगी
कभी कभी चुभती होगी उसकी बाते पर दिल की हर दर्द की शायद वो ही दवाई होगी
ना जाने भगवान ने उसे किस साचे मे ढलाई होगी
बेटे भी संभालते है माँ बाप को पर बेटी भी उस कर्तव्य की उत्तरदायी होगी
सुख दुख बाटणे और घरमे रोशनी की जगमगाहट हो इसलिये शायद भगवान ने बेटी बनाई होगी
और आज फिर कोई दुल्हन शादी के जोड़ेमे आई होगी
आपनी हाथो पर उसने गहरी मेहंदी रचाई होगी
रोई तो बोहत होगी वो जब उसे याद बचपन की आई होगी
बाबुलकाघरछोडकरअबवोपराईहोगी
By Pragati Ishwarchand Sahuji

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