दशहरा- एक संदेश
By Himani Agarwal
एक था राजा पराक्रमी और महा ज्ञानी,
अज्ञानता ने जिसे था घेरा, नाम था “रावण”,
जिसने किया सिया का हरण,
था घमंड में वो अपने चूर,
छल से किया सिया को श्री राम से दूर,
सोने की थी लंका उसकी,
जो हनुमान जी की पूंछ से जली,
प्रभु श्री राम ने रावण का अहम् तोड़ा,
ब्रह्मास्त्र उसकी नाभि में छोड़ा,
हुआ रावण का तब वध,
"जय श्री राम" थे उसके अंतिम शब्द,
हुई बुराई पर अच्छाई की जीत,
तभी से मनाते हैं हम,
रावण दहन की ये रीत,
परंतु! कौन है आज यहां श्री राम?
जो शिवभक्त, महा ज्ञानी पर चला रहा बाण,
अपने अंदर के रावण का करो दहन,
प्रभु श्री राम का मुखौटा,
ऐ बंदे! तू मत पहन,
चलो आज दशहरा कुछ अलग मनाएं,
अपने ही मन के रावण पर विजय हम पाएं।।
By Himani Agarwal

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