दर्पण की गुहार
By Navneet Gill (नवनीत गिल)
थकी, न हारी,
पर मुकद्दर मारी।
रात और दिन,
सोचे समझे बिन।
बन कठपुतली,
देकर खुद को तसल्ली।
जाती चलती,
परवाह न करती।
रहे है तलीन,
भांति बस मशीन।
नन्हीं सी परी,
उठाये, भरकम सी गठरी।
खटे इस कद्र,
सुंदर या हो भद्र।
जाये सब भूल,
काँटे या मिलें फूल।
हवा की तरह,
बहती बग़ैर किसी जिरह।
रोकर, हंस के,
सभी का करके।
दर्पण की गुहार,
लेना मन को संवार।
हे! नारी सुन,
लेना स्वयं केलिए भी बुन।
मटमैली चादर,
मिले तभी आदर।
तू! जब तलक,
छूयेगी नहीं फलक।
देख उसी दिवस,
होगा जीवन तभी सरस।
By Navneet Gill (नवनीत गिल)

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