दर्द तेरा वजूद
By Asheshwar Saw
ए दर्द तेरा वजूद क्या जितनी बार आता है, नया रूप लेकर आता है।
पल भर के लिए बैठा कोशिश की भुलाने को तुझे अगले ही पल कहने चले आते हो, तेरी गुंजाइश ही नहीं कि तू खुश रहे सीने में अग्नि की धधकती चिंगारी लेकर चला आता है जितनी बार आता है नया रूप लेकर आता है ।
इतना जलाते हो अपनी लौ में बिल्कुल अजनबी बन जाता हूं ना खुद को पहचान पाता हूं, ना दुनिया की मुझे समझ आता है ।
अपनी तरंगों के सायो की तरह लिपटा दिया तूने, तुझे सहन करने को जी नहीं करता किस गुनाह की सजा मुझे ही दिया करता है ।
लोग तिलमिलाए हुए हैं जीवन की जुगाड़ में मेरा शाकिन भी मुझे यही पूछता कहता आराम फरमाए बैठे हो, आंगन में बेफिक्र घास उग आते हैं बार-बार कम से कम साफ कर दिए होते, बेरहम हो गया हूं या तेरी लत लग गई है मुझे अपने पराए का फर्क भी मिटाए देता है।
ए दर्द तेरा वजूद क्या जितनी बार आता है नया रूप लेकर आता है
By Asheshwar Saw

Comments