दबी आवाज़ें
By Soumya Bhardwaj
उम्मीदों के पहाड़ से दबी वह नन्ही कन्या,
अपने भीतर लाखों आवाज़ें छुपाती है।
औरों की ख़ुशी की ख़ातिर,
आख़िर अपना बचपन क्यों गँवाती है?
किसी रोज़ तो उसे लाल चुनरी उढ़ा कर,
माता के रूप में पूजा जाता है।
फिर आख़िर क्यों समाज के कुछ दरिंदों के कारण,
उसका ख़ून से लिपटा हुआ शव किसी सुनसान सड़क पर पाया जाता है?
उसे ही ग़लत ठहरा कर,
उसके आत्म-सम्मान को कुछ यूँ उछाला जाता है,
जैसे कभी उसके पिता ने उसे उछाल कर खिलाया था।
किसी की गुड़िया थी,
तो किसी के लिए बस एक खिलौना।
आख़िर चिल्लाती कैसे?
जब बचपन से ही आवाज़ों को भीतर दबाना सिखाया था।
यह समाज अपनी ज़िम्मेदारियों से उतना ही दूर है,
जितना मृग अपनी कस्तूरी से था।
प्यासों की आग बुझाने में यह समाज कुछ यूँ मग्न था,
कि चिता पर जलती उस बच्ची के
माता-पिता के आँसुओं को, पोंछ न सका।
By Soumya Bhardwaj

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