दफ्तरी वातावरण
By Pragati chauhan
मोहन लाल कर्मचारी दफ्तर आता है,
जाते - जाते ग्यारह का समय हो जाता है।
जाते ही चाय का ऑर्डर चपरासी को थमाता है,
बोला आज कोहरा बहुत है, पेड़ों से पानी झड़ रहा है,
मारे सर्दी के दिमाग भी सुन्न पड़ रहा है।
चाय की चुस्की के साथ काम शुरू करना है,
देखें किस - किस की फाइल को गुम करना है।
अलमारी खोल फाइलें मेज़ पर फैलाता है,
दराज में हनुमान जी पधारे, धूप बत्ती जलाता है,
इतने में ही अध्यापक साहब आते हैं,
मोहन लाल को अपना दुखड़ा सुनाते हैं।
अनसुना कर फाइलों को छोड़ बाहर निकल जाता है,
बरामदे में खड़ा होकर सिगरेट के कश लगाता है।
एक घंटे बाद सीट पर लौटता है,
कभी फाइलों को तो कभी माथे को कचोटता है।
साहस कर अध्यापक बोले, भाई मेरे प्रमोशन की फाइल पाई,
' लाल ' बोला शायद आपने फाइल पर भेंट नहीं चढ़ाई,
इसलिए फाइल चलकर रास्ते में गुम हो गई,
इतनी अलमारियां है कहीं जाकर सो गई।
मास्टर साहब फाइल को पहिये लगाइए,
दराज के हनुमान पर चढ़ावा चढ़ाकर आशीष पाइए ,
मास्टर जी ने ५००रू का चढ़ावा हनुमान जी पर चढ़ाया,
फिर फाइलें देखी तो अपनी फाइल को 'लाल' के सामने पाया।
मास्टर जी को देख लाल जी मुस्कुराए, बोले
आपकी फाइल हनुमान जी की कृपा से ही यहां आई है,
हमने जो हनुमान जी के थ्रू आपके हाथ आपकी माया पाई है।
मास्टर जी शुक्र है आपने बजरंगी पर चढ़ावा चढ़ाया,
जिसका फल आपने तुरंत ही पाया।
यदि आपने चढ़ावे की रस्म न निभाई होती,
तो आपकी फाइल चलकर यहां न आई होती,
किसी अलमारी की फाइल में चिर निद्रा में सोई होती,
और आपने प्रमोशन की बाट सालों जोही होती।
By Pragati chauhan

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