थोड़ा बदल गया हूंँ मैं
By Karan Bardia
थोड़ा बदल गया हूंँ मैं,
नहीं कुछ हुआ नहीं है बस दुनिया की भाग दौड़ से ठक गया हूं मैं,
मुस्कुराता कम हूंँ आज कल, अपने ही आप में खोया रहता हूं मैं,
शायद कुछ खो गया है मेरा,
इसिलिए आज कल सबके साथ होकर भी अकेला रहता हूं मैं।
किसी का फोन नहीं उठता हूं मैं,
हमशा बिजी़ होता हूं या फिर लोगों से बात ना करनी पड़े इसिलिए खुद को बिजी़ दिखता हूंँ मैं,
रूड़ लगने लगा हूं मैं सबको, शायद इसिलिए सबसे दूर हो चुका हूंँ मैं,
माना ये भी एक दौर है जीवन का, जो गुजर जाएगा,
बस इस दौर से मस्कुरा कर निकलने की कोषिश कर रहा हूंँ मैं।
अपने आप से ही बातें करता हूंँ मैं,
खुद की गलतियां खुद ही ठीक कर रहा हहूंँमैं,
अकेले में ही रोता हूंँ, टूटे हुए अपने दिल को खुद ही जोड़ता हूंँ, और कहीं रुक जाने पर आगे बढ़ने की शक्ति के लिए खुद को ही टटोल रहा हूंँ मैं,
माना थोड़ा मुश्किल है ये पर हो जाएगा,
शायद इसिलिए लोग कहते हैं की बदलते वक्त के साथ साथ उभर रहा हूंँ मैं।
मन बहुत बदल गया हूंँ मैं,
मैं हुआ करता था एक हसमुख चेहरा पर अब बिलकुल शांत हो गया हूंँ मैं,
थाका नहीं हूंँ और न ही हारा हूंँ, बस अपनी प्रगति की राह में थोड़ा धीमा हो गया हूंँ मैं,
अब तो बस इंतजार है उस रोशनी का जो बदल दे किस्मत मेरी,
और फिर मैं कह सकता हूं दुनिया से कि अपने अच्छे और भले के लिए ही थोड़ा बदल गया हूंँ मैं।
By Karan Bardia

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