थका थका इसे लिक्खूं
By Usaid Shaikh थका थका इसे लिक्खूं; रुका रुका लिक्खूं क़लम को कैसे भला अपने बे वफा लिक्खूं अयां है मेरे सलासिल से मेरी आज़ादी बहार भी तो है मत्लूब; गर खिज़ां लिक्खूं लिखूं के लिख ना सकूं जाने साहिलों पे कभी सो चंद शेर समंदर के दर्मियां लिक्खूं
शरारतें ना गईं मुझ से अब भी मक्तब की हक़ीक़तों के वरक़ पर महेज़ गुमां लिक्खूं सुराग अपना मिला है तो सोचता हूं मैं के खुद को भूलते रहने की क्या वजह लिक्खूं है शब को आस्मां मेरा; तो दिन में हमदम है ये क्या के साये को अपने मैं बे वफा लिक्खूं अयां = स्पष्ट सलासिल = ज़न्जीरें मत्लूब = उद्देश्य; लक्ष्य खिज़ां = पतझड़ मक्तब = स्कूल महेज़ = केवल गुमां = कलपना
By Usaid Shaikh

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