तक़सीम
By Jeeshant mathur
धरम धरम की बातों में गलियों का बटवारा हो गया
पीछे वाली गली मुसलमानो की होगयी आगे का हिस्सा हमारा हो गया
अब साथ मिलकर न ईद मनाई जाती हैं न दिवाली का खाना होता हैं
वह भूल कर भी मेरे घर नहीं आता न मेरा उसकी चौखट पर जाना होता हैं
अपनी अपनी छतो पर अब पतंग उड़ानी पड़ती हैं
आसमान साफ़ करने वालो को अब आपस में लड़ानी पड़ती हैं
हर बार अज़ान के वक़्त घर से बहार चला जाता हु
वोह भी समझता हैं मैं बेवजह उससे क्यों टकराता हु
सोचता हु की गले लगा लू
अगर लगा लिया तोह दंगे हो जायेंगे
फिर वही सियासत होगी
फिर वही लोग वापस आएंगे
कल जिन लोगो ने दंगो में उसका घर फूख दिया था
आज वही लोग मेरा भी घर जलाएंगे
एक मुक्तसर कहानी यह इसे इतना क्यों बढ़ाना
तक़सीम की बुन्याद पर जीना हैं क़यामत के इंतज़ार में मरजाना
अब जब भी विदा लेता हु उससे कहने को बोहोत कुछ हैं पर दिल रुक सा जाता हैं
मैं भी चलते चलते एक आखरी दफा पलटता हु वोह भी पलट कर एक आखिर दफा देख जाता हैं
कहने को बहुत कुछ था पर हम नज़रे चुराते गए
आज दो भाई फिर हार गए और मज़हब जीताके गए
By Jeeshant mathur

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