त्याग
By Syed Aamir Razaa
त्याग जुड़ा ह्रदय से जैसे की कंपन,
ज्यों ही खुला इस नैन की दरपन ।
फंसे मझधार में किसे सुनाते गुहार,
संघर्ष कोई ना सुनता,
कहते यह तो जीवन का आहार ।
दिन बनें देखते ही देखते साल,
भला बदला कभी ही बिखरा ये हाल।
हारा मैं खुद से कोई क्या करता वार,
शुरू की थी जो कथा, बन बैठा उसी में किरदार।
By Syed Aamir Razaa

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