तेरे आंचल की छांव
- Hashtag Kalakar
- Nov 29, 2025
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By Khushbu Vandawat
कड़कती धूप में छाँव हो तुम,
मानो हर इन्तिहा के बाद आया आराम हो तुम।
पढ़ी-लिखी न होकर भी डॉक्टर हो तुम,
मानो हर ज़ख्म का मरहम हो तुम।
अँधेरी रात में पहला उजाला हो तुम,
मानो हर मुश्किल के बाद भी जलता दिया हो तुम।
बंजर ज़मीन पर खिला फूल हो तुम,
मानो हर मुश्किल का हल हो तुम।
पतझड़ में पत्तों को गिरते देख कुछ याद आया,
मानो तुमने अपना हर सपना छोड़ मेरा सपना सजाया।
माँ, तुम तो एक फ़रिश्ता हो,
धरती पर कुदरत का करिश्मा हो।
चाँद से प्यारी चाँदनी और चाँदनी से प्यारी तुम,
जिसके आगे जन्नत भी झुके — वो बेमिसाल ख़ूबसूरती माँ हो तुम।
By Khushbu Vandawat

Loved it
Very emotional and heartfull poem
Lovely. And emotional
so emotional