तेरी आस क्यों है ?
By Shivshankar Santosh Patwa
बारिशों में भीगकर ही क्यों सुकून मिलता है ?
इस रुह को इतनी प्यास क्यों है ?
इन बूंदों के छुवन से क्यों, आँखें बेहने लगती है ?
कैसा रिश्ता है, ये एहसास क्यों है ?
बूंदें है ये दरिया नहीं, क्यों तू डूबा जाता है
इनमे जो ढूँढता है तू, इतना खास क्यों है ?
सच ये कि वो ख़्वाब है तेरा, ख़्वाब यही वो तेरा सच है
इतनी सादी तेरी नींद, तेरे लिए ही राज़ क्यों है ?
शाम से सुबह तक बस सोचता रहा हूँ
इस रूह को तेरी आस क्यों है ?
By Shivshankar Santosh Patwa

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Nice