तू शब्दों में खोजता रहा जिसे
By Shweta K
तू शब्दों में खोजता रहा जिसे,
वो आंखो ने कह दी थी।
कुछ ज़्यादा उम्मीदें थीं तुझसे..
दिल की बस यही खता थीं….
तेरी बेरुखी पर भी,
हम यूं मुस्कराते रहे।
इकतरफा है जानकार भी,
हम प्यार निभाते रहे।
महफ़िल में शामिल अजनबी भी,
तुझे अपने ही लगते रहे।
और हम तेरे साथ को ही,
अपनी महफ़िल समझते रहे।
बोलचाल होती रही ,
पर बाते नहीं हुई कभी,
तेरी शिकायतों में भी,
मै तारीफ तलाशती रही।
खुद में पूरी हूं संपूर्ण हूं,
ये जानकार समझकर भी,
जाने क्यों तेरे वजूद में मैं ,
अपना वजूद तलाशती रहीं।
अक्सर बातों के बीच भी,
खामोशी सी रहती है,
तुम साथ चल तो रहे हो,
फिर भी राहे तनहा ही लगती है।
लड़ना नहीं आता मुझे ,
ये तुम्हे भी पता है।
हर बार तुम्हे ही रूठने दिया,
यहीं मेरी खता है।
तेरे आंखों में खुद को,
मै तलाशती रही जाने क्यों।
झूठे तेरी मुस्कुराहटों को,
चुपचाप निहारती रही जाने क्यों।
अक्सर दिल के दर्द को,
आंखो ने तुझसे कहना चाहा,
पर तुम शब्दों में ढूंढते रह गए,
जो खामोशी ने तुमसे कहना चाहा।
ये तेरी बेरुखी ही थी,
जो हमारे बीच फासले बन गए।
दिल के इतने करीब आकर भी,
तुम आज फिर से अजनबी बन गए।
मैं चाहकर भी शिकायतें,
कर नहीं पाती तुमसे तुम्हारी ही।
बड़ी कशमकश है दिल की,
कैसे तुम्हे चाहे भी, और ना चाहे भी।
By Shweta Kumari

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