तू बाहर क्या खोजता है!
- Hashtag Kalakar
- Dec 10, 2025
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By Pragati Dandriyal
भीड़ भरी इस दुनिया में, शोर हर तरफ गूँजता है
नादान यह मन बड़ा, दर-बदर भटकता है
अर्थहीन बातें क्यों व्यर्थ तू सोचता है
संपूर्ण सार तो भीतर तेरे, तू बाहर क्या खोजता है!
दौड़ भौतिकवाद की भीषण में, पीछे मानो कुछ रह गया
है भूख भी तो बस पैसे की, ईमान सबका बह गया
इंसानियत का मोल नहीं बस दिखावा सबका बोलता है
वाह रे मनुष्य! तू भावनाएँ भी तराजू में तोलता है
भ्रमजाल ये झूठी शान है, फिर क्यों ईमान तेरा डोलता है
मानवता तो भीतर तेरे, तू बाहर क्या खोजता है!
कर्म एक भला नहीं, पर हाथ जपता माला है
विश्वास की डगर हिला, अंधविश्वास बस पाला है
और! तू क्या उसे कुछ दे पाएगा, वह स्वयं जग-विधाता है
यह फूल उसका, धन उसका, फल उसका, कण-कण उसका
हर जीव का वो निर्माता है
फूल रेशमी हो कैसे जब काँटा तू बोता है
खुद कुकर्म करके तू गंगा में क्या धोता है?
संत तू बना फिरे, फिर क्यों धर्म नहीं तेरा टोकता है
पुण्य तो भीतर तेरे, तू बाहर क्या खोजता है!
बने मुख से मधुर, चित्त ईर्ष्या से दूषित है
प्रेम का परिधान पहने, द्वेषी बैठा विभूषित है
मित्रता की ढाल लिए, वार सटीक फलता है
गवाह स्वयं इतिहास है, अपना अपने को छलता है
जकड़ स्वार्थ की जंजीर में, तू मूल भाव भूल कैसे?
प्रेम से सृजन, प्रेम में विलीन
तत्वों का शरीर फिर तत्वों में मिलता जैसे
प्रेम से घृणा? यह तो पूर्ण अबोधता है
प्रेम तो है भीतर तेरे, तू बाहर क्या खोजता है!
तो, आ, ढूँढ उस प्रकाश को जो इन सन्नाटों में कहीं खोया है
जगा भीतर के उस मानव को जो मूर्छित हो वहीं सोया है
उठा पुण्य के परचम को, डोर जिसकी तेरे पास
पहचान प्रेम के उस कण को, जिसका अनन्तकाल से तुझमें वास
नाभी गृह उस सुगंध का जो कस्तूरी मृग बाहर सोचता है
वही सुगंध भी भीतर तेरे, तू बाहर क्या खोजता है!
सब कुछ तो भीतर तेरे, तू बाहर क्या खोजता है!
By Pragati Dandriyal

loved it 😍
Nice 🙌
बहुत ही शानदार कविता ❤️✨
Aati sundar 🌻🤍
❤️