तुम्हें भूल पाना आसान नहीं.
By Gunjan Toshniwal
भला कैसे कोई भूल जाता है अपनों को,
उनके साथ बीते लम्हों को,
उन जिंदगी के कुछ हसीन पन्नों को,
कल सजाए हुए आज को,
भला कैसे कोई भूल जाता है अपनों को ,
और मैं कैसे भूल जाऊँ उस इबादत को,
रोज़ तुम्हारा ज़िक्र करने की आदत को,
मैं कैसे भूल जाऊँ हमारी पहली मुलाक़ात को,
तुम्हारे साथ हुई मेरी उस आख़री बात को,
मैं कैसे भूल जाऊँ सादगी से भरी तुम्हारी आँखों को,
उनमे छिपे हुए तुम्हारे हालातों को,
भला मैं कैसे भूल जाऊँ उस वस्ल की रात को,
तुम्हारे अक्स में छिपे मेरे ज़ज्बात को,
मैं कैसे भूल जाऊँ हमारी कस्मों को,
ग़ालिब की नज़्मों को,
मैं कैसे भूल जाऊँ तुम्हारी उस फ़रियाद को,
तुमसे जुड़ी हुई हर एक याद को,
मैं कैसे भूल जाऊँ तुम को,
और तुम्हारें साथ जुड़े उस हम को,
इतना सब कहने के बाद मेरा सिर्फ़ एक सवाल है तुमसे -
तुम भी मुझे भूल ना पाती हो क्या?
By Gunjan Toshniwal

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