तुम्हारी मॉ
By Disha Kedia Gupta
वो जो चिट्ठी उनकी आती थी.
मन को भीतर तक छू जाती थी.
उनके हाथो को वो ख़ुशबू,
ना जाने क्या जादू कर जाती थी.
लाखों थी दूरियाँ पर वो अल्फ़ाज़,
कराते थे अपने आसपास होने का अहसास.
अब तो बस कोई चंद लफ़्ज़ों का forwarded message आता है.
हाँ ज़िंदा है हम बस ये ही बताता है...
पर उस जमाने में माँ का संदेशा आना,
मन को बचपन की गालियों में ले जाता था.
थी माँ मेरी अनपढ़,
वो बड़ी मान मनौवाल करके किसी को मनाती थी.
फिर उसकी चिट्ठी मुझ तक आती थी.
वो जो मॉ की चिट्ठी आती थी,
जो दिल को छू जाती थी.
मेरी अनपढ़ माँ ना जाने किस किस से लिखवाती थी.
बिटिया रानी!
".खुस रहो",
बैसाख जा रहा है.
जेष्ठ लग जाएगा.
तुम्हारे बच्चों की छुट्टियाँ होने को है.
दामाद जी से कह कर टिकट करवा लेना.
भाई को भेज दूँगी लिवाने को.
वो छत का पंखा ठीक करवा लिए है.
खेत में कुयें पर मोटर बिठा ली है.
घर में नल में में भो पानी आता है.
और अब "बाहर " नहीं जाना पड़ता.
घर में ही बनवा लिए है.
गये साल बच्चे बहुत कमज़ोर लग रहे थे.
सहर में कहाँ असली दूध घी मिलता है.
गाय भैंस दोनों ब्या गई है.
महीने भर में बच्चे ठीक हो जाएँगे.
थोड़ा घी ले भी जाना.
दामाद जी सारा दिन दफ़्तर में आँख गड़ाते है.
ठीक रहेगा.
वो तुम्हारी सहेली सुशीला भी आएगी.
उससे मिलना हो जाएगा.
उसका बेटा इसबार पिछली जमात(क्लास) में ही रह गया.
तुम अपने बच्चों की बड़ाई मत करना.
उसको ख़राब लगेगा और इनके नज़र लग जाएगी.
अब तो बस आ जाओ.
बाक़ी मिलने पर.
तुम्हारी मॉ.
By Disha Kedia Gupta

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