तुम्हारी अनुपस्थिति में
By Sushant Saurabh
याद रखना चाहता हूं,
बिस्तर के हर एक सिलवट को
जो तुम्हारे सोने से पड़ी थी।
कैद कर लेना चाहता हूं,
खिड़की के शीशे में
तुम्हारी धुंधली सी प्रतिबिंब को
जो तुम्हारे चेहरे के किरणों से
टकराकर बनी थी।
सहेज लेना चाहता हूं,
हर वो स्पर्श को
जो चलते वक्त, जाने अंजाने में
तुम्हारे हाथों ने जानबूझकर, गलती से छुए थे।
महकना चाहता हूं,
तुम्हारे रेशम जैसे केश के धागों को
जो टूट कर बिखर गए थे तुमसे
और मेरे कमीज़ से लिपट गए थे।
तुम्हारी अनुपस्थिति में,
बहल लिया करूंगा, इन्हीं
चीजों,
यादों,
स्मृतियों से।
By Sushant Saurabh

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