तुम्हारा दिल
By Vikas Kumar
एक मेरा ये जख्म हैं की कभी भरता हीं नहीं।
एक तुम्हारा दिल है जो अब भी पिघलता हीं नहीं।
वो इश्क़ की बाती जो तुमने हीं सुलगाया था।
तुम्हारे बेहिसाब फुंको से वो बुझता हीं नहीं।
तेरे आगोश में जो सपने बुने थे कभी हमने।
ज़माने के झंझावातों से वो बिखरता हीं नहीं।
तेरे इश्क़ की इबादत में हमने जब चांद को चूमा था।
इन लबों को अब और कुछ भी जंचता हीं नहीं।
तेरे हसीन पैकर से लिपट कर जो सुकून मिला।
वैसा सुकून किसी समाधि में भी मिलता हीं नहीं।
जब तुझको भी आना हीं है तो कल क्यूं आज क्यूं नही।
तुम्हारे बिन ये बावरा मन अब अब कहीं भी लगता हीं नहीं।
एक तुम्हारे न होने से कितने सृजन विलंबित होंगे।
एक तुम्हारा दिल है जो अब भी पिघलता हीं नहीं।
By Vikas Kumar

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