तुम ही अंतकार
By Shobha Joshi
परमात्मा तुम जैसे चंदन
जिसका बन जाओ तुम आवरण
शीत हो जाए उसका ही मन
और उसी की सुगंध से
चहुंपास हो जाए मगन।
परमात्मा तुम जैसे नीर
धारण करे जो गगन
बूंद बन गिर जाए तो
ऋतु वर्षा का हो आगमन
सूर्य की प्रचंड ज्वाला से
जब सम्पूर्ण सृष्टि हो खिन्न
तो वृष्टि ही एक मात्र विकल्प
जिससे तृप्त हो सकल भुवन।
परमात्मा तुम जैसे भाव समर्पण
क्रूरता असीमित जिसमें
डरता जिससे सम्पूर्ण कानन
वो सिंहनी भी शावकों को अपने
खूनखोर जबड़ों में करती जब धारण
क्षति न कोई आघात
कि जड़ विकट पशु में भी ममता का
ऐसा भाव कर देते हो अर्पण।
तुम ही रचने वाले
तुम ही विरचने (सजाने) वाले
तुम ही रखने वाले
तुम ही परखने वाले
तुम ही जानने वाले
तुम ही जनाने वाले
हर करनी हर विधा
तुम्हारी ही संविधा
शून्य से शंख तक
आदि से अंत तक
सूक्ष्म से अनंत तक
धरती से अंब तक
स्वामी तुम ही
तुम ही कथाकार
तुम ही चित्रकार
तुम ही तो हो अथकार
और तुम ही अंतकार।
By Shobha Joshi

Comments