तुम स्वयं प्रेम बनो
- Hashtag Kalakar
- 38 minutes ago
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By Deependra Srivastava
जगत मे हीर रिजहायी आसानी से जा नहीं सकती
तुम रूठो तो पलट के आ नहीं सकती
प्राण वार दो तो भी थोड़ा है
किसी के लिए अब हीर त्याग कर नहीं सकती
हर कोई रिश्ते मे हो ये आम है
पर हर हीर – राँझे प्रेम ही हो ये कोई आँख बतला नहीं सकती
जगत मे हरि रीज़ आसानी से जाता
इतना घमंड तीन लोक के मालिक के मन मे भी ना आता
अब इंसान इतराते बहुत है बेईमानी को अपना समर्पण देकर
वफ़ा को ठुकराते बहुत है
गलत सही का भेद नहीं पर प्रेम का वादा करते बहुत लोग है
स्वयं का ज्ञान जिसे नहीं वो भी अब प्रेम करते है
दीपेन्द्र तुम अब स्वयं प्रेम बनो
यहा कोई हीर अब प्रेम नहीं
By Deependra Srivastava

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