तुम विचारों की गहनता में विलय हो
By Surjeet Prajapati
तुम विचारों की गहनता में विलय हो,
मैं भी तुमको देख के खोया हुआ हूँ,
क्यूँ ऐसे बैठी हो सुबह-शाम तुम,
कि खामोश इक मौन को थाम तुम,
क्यूँ कह नहीं देतीं जो हृदय में छुपा है,
न उद्गार बनने दो इसे अब आज तुम,
कि डूब जाओ उसमें तुम, और मैं भी,
हो जाओ इस संसार से भिन्न तुम,
मैं भी तुममे हो समाहित इस जगत को छोंड़ दूँ,
फिर अस्तित्व क्या होगा हमारा?
अनभिज्ञ हो जायेंगे हम सभी के लिए,
ये बात मेरी मान क्यूँ न ले रही हो आज तुम,
मैं समझता हूँ तेरी सारी परेशानियों को,
तू रह नहीं सकती मेरे बिन सह नहीं सकती तनहाईयों को,
इसी कारण तो तू परेशां हुई है,
जो तू पहले टूट गई तो मेरी भी आशा खुई है।
जाति धर्म ने बांट रखा है जिसे,
रूढ़िगत परम्पराओं ने जकड़ रखा है जिसे
तो ऐसे जमाने से जो तू हार जाए मैं अकेले लड़ न सकूँगा,
प्रेम के पावन अटूट बंधन में बंध न सकूँगा,
तो माना कि तू और मैं मजबूर हैं,
लेकन इस तथागत से नहीं दूर हैं,
दूरियाँ फासले माना कि मुनासिब नहीं सह पाएँ हम,
तो इससे अच्छा चलो इस जहाँ से कहीं दूर चले जायें हम।।
By Surjeet Prajapati

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