तुझ से मिलना मेरे लिए कैसा है
By Gaurang (Gaur_Mats)
तुझे क्या पता, कि तुझसे मिलना मेरे लिए कैसा है। तुझे कैसे समझाना है, ये मैं नहीं समझ पाता। क्या करूँ, कैसे बयाँ करूँ तुमसे अपने मन की दास्ताँ- इसी कश्मकश में समय निकल जाता है मेरा।
ऐसा लगता है कि अचानक से बरसों पहले खामोश हुए होठों पे एक नज़्म ने दस्तक दी हो,
या फिर कितने ही समय से रखी हुई एक सूखी कलम में किसी ने रंगीन स्याही से अपने मन की गहराई में दफ़न हुए सारे जज़्बात और राज़ एक सुन्दर सी कविता के रूप में उतार दिया हो एक कोरे कागज़ पर,
या किसी तूफानी बरसात में किसी कश्ती को अचानक सूरज की रोशनी में चमकता हुआ एक साहिल मिल जाये।
By Gaurang (Gaur_Mats)

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