तिरंगा
By Khushbu Vandawat
मेरा एक सपना है,
मुझे पढ़ना-लिखना बहुत अच्छा लगता है,
ना चाह है डोली बारातों की,
बस तिरंगे में लिपट जाऊँ — यही इच्छा है मेरे अरमानों की।
भगवान न करे मुझसे कोई गलती हो जाए,
कहीं मेरी फौज में जाने का सपना अधूरा न रह जाए।
त्रिरंगे के रंग सबसे प्यारे लगते हैं,
उन तारों से भी खूबसूरत, खाकी के सितारे लगते हैं।
खुले आसमान में उड़ने की चाह रखती हूँ,
क्या ग़लत है अगर मैं फौज में जाने का अरमान रखती हूँ।
हाँ, कमजोर हूँ मैं — पर ग़लत नहीं,
थोड़ी कोशिश करूँ तो किसी से कम नहीं।
ना जाने किस बात से डर जाती हूँ,
सही होने पर भी सहम जाती हूँ।
होगा माता-पिता को भी गर्व मुझ पर,
जब देखेंगे वो तीन शेर मुझ पर।
कामयाबी खुद चलकर आएगी,
जब मेरी मेहनत रंग लाएगी।
By Khushbu Vandawat

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