तारीक रातें
By Vikas Kumar
तेरे बिन तन्हा गुजारी है मैने ये तारीक रातें।
तेरे बिन तन्हा गुजारी है मैने ये सुलगाती बरसातें।
यूं तो मेरे पास हर पल रहे तेरे ख्वाब ओ खयाल।
यूं तो तेरे तस्सवुरात से हीं रौशन थी मेरी हयात।
पर कब तलक ये फकत ख्वाब ओ खयाल मुझे बहलाएंगे?
और कब तलक तेरे तस्सवुरात मेरे जख्मों को सहलाएंगे?
कब तलक ये दौर ए मयकशी हीं मुझे शादाब करेंगे?
कब तलक तेरे ख्वाब ओ खयाल हीं मुझे आबाद करेंगे?
इन सुलगाती बरसातों में वस्ल ए हसरत ने बस नाशाद किया है।
इन तारीक रातों में शब ए फुर्कत ने मुझे बस बर्बाद किया है।
अब अहद ए वफ़ा की परवाह नहीं, अब और तेरा इंतजार नहीं।
अब उस इश्क़ की मुझे चाह नहीं, मैं वफाओं का तलबगार नहीं।
ये दौर ए मयकशी हीं मुझे उल्फत ए एहसास कराए क्यूं?
इस सिगरेट के धुएं में हीं तुम्हारी आकृति नजर आए क्यूं?
हां जिंदगी के चार दिन को तुम्हारे प्यार ने हीं शादाब किया।
पर इस सदा लौह को उसी चार दिन के प्यार ने हीं बर्बाद किया।
By Vikas Kumar

Comments