तन्हाई
By Mrinalini Gajbe
शाम ने पुछा तन्हाई से ,
आज भी क्या नहीं मिलोगी मुझसे !
तन्हाई सकुचाई ,
उदास नज़रों से देख ,
मुंह फेर कर चली गई !!
शाम से रहा न गया ,
शीत हवा के झोके संग ,
तन्हाई के पीछे भागी ...
तन्हाई के केश,
झोंको संग लेहराये ,
शीतालता लगी उसे सेहलाने !
शाम की साँवाली रंगत ,
तनहाई को लगी निखारने ,
देखा उसने अंबर की ओर ,
सूरज ढलने की कागार पर था ,
लालिमा का रंग चहु ओर बिखरा हुआ था ,
पंछी घरोंदों की तरफ लौट रहे थे !
तन्हाई ने आँखे मूंदी,
अक्स एक मन में उतरा ,
होंटो पर हलकी मुस्कान छाई ,
आँसु की एक बूंद छलकी ,
तन्हाई ने बाएँ फेलायी ,
और शाम की शीतालता में खो गई.....
By Mrinalini Gajbe

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