तकलीफ़ - ए - बयाँ
By Pulkit Tiwari
आज हम फिर बैठे थे कोने में,
हाँ तकलीफ थी थोड़ी सोने में।
रातों का समा ना बीत पाता था,
दिन का दरिया भी दर्द सा ठहराता था।
सुबह की चाय शुभ हो ना हो,
शाम का समा आंखों से छलक आता था।
अभी हफ़्ते भर और थे इस दर्द को पिरोने में,
हाँ तकलीफ थी थोड़ी सोने में।
पहली बार उस राह पर,
जब लाल रंग से पाला पड़ा।
छिपते छिपाते घर पहुंची,
था सबके मुंह पर ताला पड़ा।
दी हिदायत की इज्जत है, चुप होने में,
हाँ तकलीफ थी थोड़ी सोने में।
ना जाने लाल रंग से है क्यूं नफरत इतनी,
है एक ही रंग में भेद क्यूं।
वही रंग माथे पे लगे तो बिंदी,
वही अंग से बहे तो खेद क्यूं।
इस रंग की खोज के सिलसिले में,
हाँ तकलीफ थी थोड़ी सोने में।
समय समय पर पता चला,
ये कष्ट तो अभी छोटे हैं।
समाज के नियम कानून,
अपने ही घर में बैठे हैं।
मंदिर में कदम डाला तो पाप लग जाएगा,
दूर से ही देखो तुम पास कोई और चला जाएगा।
नियमों के पहले नियम ने ये बता डाला,
जग का पालनहार जिसने अब तक है संभाला,
वो भी कुछ दिन अब छुट्टी में बिताएगा।
क्यूंकि हमारे अंदर जाने से मंदिर अशुद्ध हो जाएगा,
इस अशुद्धता को दिनचर्या में संजोने में,
हाँ तकलीफ थी थोड़ी सोने में।
काले पैकेट का वो सामान,
नज़रे ऐसी जैसे कर रहें हो अपमान।
जल्दी से लाते पैकेट घर में ऐसे,
जैसे धर लिया हो बम सा कोई सामान।
बड़ी मुश्किल है ऐसी हालातों में जीने में,
हाँ तकलीफ थी थोड़ी सोने में।
कपड़े बरतन अलग रख कर,
सारे दुख दर्द परे रख कर।
उन दिनों जब सबकी जरूरत थी,
तब हर एक चलती मूरत थी।
इन मूरत को पिघलाने के पसीने में,
हाँ तकलीफ थी थोड़ी सोने में।
समाज की इस कश्ती में,
जाहिलों की इस बस्ती में।
एक एहसास जगाना जरूरी है,
एक कलंक मिटाना जरूरी है।
इस कलंक मिटाने के रास्ते में,
आप एक अहम हस्ती हैं।
इन जैसों की नगरी में,
फर्क पड़ता है आपके होने में,
फर्क पड़ता है आपके होने में,
आज हम फिर बैठे थे कोने में,
हाँ भईया तकलीफ बहुत थी सोने में।
By Pulkit Tiwari

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