ढांढस
By Shreya Mishra
गीले सपनो को धूप दिखा
चोटिल मन को ढांढस तू बंधा
कुंठा की लिपटी तपिश को
त्यज कर आशा की बाहे थाम
निज ग्लानि, रोष क्यो फैला सा ?
प्रयास का कैसा अकाल हुआ?
कलुषित तम क्यो आधार बना?
और रुग्णता है हार बना,
विकृत मन का विस्तार हुआ,
ठोकर खाकर अभिमान गिरा,
जग की बातो का ओढ़ लबादा,
सहमा सा रहता काहे कण,
अभिलाषा को ले हाथ में
अधरो पर रहे मुस्कान सही।
माना कंटक का घना है वन
गुलाब सी महकती बगिया भी
क्रंदन का उमड़ा मेघ कभी
धीरज का ले तू हाथ वहीं
न दोषारोपण कर जग पर
हुनर से अपने ,जग को रिझा
किस्से व कहानी बनते है बहुत
है कटु, मिष्टी का साथ कही
जीवन के बिखरते स्वाद कई
बाजीगर बनना हर बार तू ही।
By Shreya Mishra

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