डायरी साल के आखिरी दिन की
Updated: Jul 15, 2025
By Anamika
31 दिसंबर, 2024
मंगलवार
उफ्फ मेरे खुदा, क्या दौर था ये!
आखिरी पड़ाव पर खड़ी अब मैं जब पीछे देखूं तो एक साथ कई भावनाएँ उमड़ रही हैं। मेरे अंदर के बुरे से बुरे जज्बातों का एहसास कराया इसने। मुझे अपनी कमियाँ और दूसरों की फितरत पता चली। कुछ ऐसे काम भी किए जो कभी सपने ही थे। पर खुशी के गिने-चुने पलों में दिल में भी कोई न कोई गम साथ रहा। जहाँ मुझे अपनी मंज़िल का भ्रम हुआ, वो बस एक मृगतृष्णा थी। पुरानी राहें ही गलत थीं मेरी। ज़िंदगी वैसी नहीं हुई जैसी सोची थी। पर मैं जरूर बदल गई। अब ना वो रिश्ते वैसे रहेंगे, ना मेरे तरीके। अब जो पीछे छूट गया, फिर वापिस नहीं आ पाएगा। और आगे जो होगा, वो पिछले जैसा बिल्कुल नहीं।
बाकी हर एहसास को शब्द बयां कर भी नहीं सकते। बस इतना मालूम है कि अपेक्षाएँ टूटी हैं, उम्मीद नहीं।
By Anamika

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