डायरी
By Noorussaba Shayan
दराज़ के कोने से इक डायरी मिली
डायरी नही यादों की पिटारी मिली
पीले पीले पन्नो में लिखावट कुछ धुंधली है
पर उस पर लिखी इबारत अब भी ताज़ी है
इक पर गुलाब उकेरा है पर अब कुछ मुरझाया सा है
इक पर सतरंगी किनार सजी है पर रंग फीका सा है
इक पर सुर्ख़ सा दिल है पर सुराख़ न जाने कितने हैं
आगे के पन्ने सादे मगर बड़ी बड़ी तहरीरों से भरे हैं
और उसके बाद के काफ़ी सफे
लफ्ज़ों से ख़ाली बस पीले पीले
ज़िन्दगी के हर जज़्बों को जी कर
अच्छे बुरे सब दौर से गुज़र कर
आज मैं भी
कितना पीला और पुराना हो गया हूँ
कितना ख़ामोश और सूना हो गया हूँ
By Noorussaba Shayan

Comments