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डरे डरे से कदम

Aug 11, 2025
7 min read

By Vijay Kumar Nagar


खो गया है चाँद ख़ुशी का. परेशानियों के बादलों में

उलझनों में उलझे हैं हम. गुजरते राहे हयात से.

मजमे में तलाशते हैं. मिल जाए कहीं. दिल को सुकून

हमदर्द लगता है गर कोई. दूर खड़ा मिलता है.

ख्याल जज़्बात का दूर. नजदीकियों से परहेज करता है

हर कोई चेहरे पर. सवा लात लिए मेरे मिलता है.

कोई कहता दीवाना. मुहब्बत का मारा है

मुफलिसी के निशानात लिबास पर जो मोजूद हैं.

एक खूबसूरत चेहरा. खिड़की से नमूदार होता है

मखौल करती सुरीली आवाज़. पड़ोस में कहती है.

देकर कुछ खाने मुफ़लिस को. कमा लो सवाब

खुश कर देता है उनका. दिल्लगी करने का अंदाज.

मैं बनता देख मज़ाक अपना. आगे बढ़ता हूँ

चेहरे पर दहशत. लबों पर तबस्सुम लिए चलता हूँ.

मनहूसियत है छाई हुई. अजीब हर तरफ़ हवाओं में

हर तरफ़ दिखते हैं. सर्द आहों से झुके मकानात.

उजड़े दयार से नज़र आते हैं. बे हलचल बे आवाज़

सदमे में हैं हवाएँ भी. गुजरती हुई वीरान गलियों से.

गुजरता है कोई. ख़ुद को बचाते खौफजदा गलियों से

मौत ढूँढती है शिकार. उखड़ी साँसों पर होकर सवार.

आफ़त आसमानी नहीं. करतूत है इंसान की

बगावती हो गई है. लैब के शिकंजे से निकल कर.

कोई नहीं पाया निकल. बड़ा छोटा इसके चंगुल से

सज़ा याफ़्ता होता है हर कोई बेगुनाह दो हफ्तों की.

चल भी जाये इंसान. कितनी शह और मात

इंसानी क़दम के आगे. कुदरत की चाल भारी है.

रहम ओ करम पर है रब के. ज़मीं पर इंसान की हस्ती

बा करम ही क़ायम है. इंसान की सांस.

दहशतजदा है हर शख्स. मुंह पर लगे नकाब में

साँसों की बीमारी कहीं. लग ना जाए सांस से.

मयस्सर नहीं होता मिश्री घोलता. कानों में दिलबर की आवाज़

सुनता हूँ तो बस छन कर आती. नकाब से आवाज़.

हर जुमले से गायब हो जाता है. कोई न कोई लफ्ज

मंज़िल ए कान तक का. सफ़र तय करते करते.

आता है काम तजुरबा. दर मियाँ बुरके बात करने का

धुन्ध छा जाती है ऐनक के शीशों पर. करते हुए बात.

जिस्मों के अब फासले दरम्यान दिलों के हो गए हैं

दूरियाँ और बढ़ जाती है. सुन कर खाँसने की आवाज़.

सेनेटाइजर का दर्जा गोया. गंगाजल का हो गया है

हाथ धोना हर चीज़ छूकर. लाज़िमी हो गया है.

शफाखाने ले जाती है. नाक छींकने की आवाज़

गले मिलना दूर. पास खड़े रहना दूभर हो गया है.

मुहब्बत में अब फ़ासला कोविड का हो गया है

दखल अब विसाल ए यार में. कोरोना की हो गई है.

करिश्मा कुदरत का. लव प्लेटोनिक हो गया है

पी-सी आर टेस्ट अब मुहब्बत में. ज़रूरी हो गया है.

कल तक थे जो मेरे. दिल की धड़कन के साथ

सुनाई देना बंद कहीं. उनकी धड़कन ना हो जाए.

खुदा ना करें कहीं. कोरोना से यारी हो जाए

सज़ा मिलती है. दो हफ्ते अपनों से जुदा रहने की.

जद्दोजहद करते हैं. दीवारों से बात करने की

महबूब के दरमियान खड़ी है. दुश्मन मोटी-सी चिलमन.

दोज़ख़ी हवाएँ उतार दी है. शायद धरती पर रब ने

जिंदा रहना है तो दे. क़ीमत साँसों की अब दुनिया में.

बीमार हैं ज्यादा. तादाद तबीब की कम है

भर चुके हैं शफाखाने. आमद बहुत है मरीजों की.

बिस्तर मोहिया होता है यहाँ. सिर्फ रसूख दारों को

बाकी जीने की आरजू लिए तड़पते हैं ज़मीन पर.

कुछ पड़े हैं ज़मीं पर मायूस. ज़मींदोज़ होने के लिए

कोई हाथ जोड़. दर्दीली आवाज़ में विनती करता है.

दिलासा देती रहती है नर्स. बरामदे में लेटे मरीजों को

कोई-कोई तो नर्स के. पेरो को लगा हाथ जोड़ता है.

इंतज़ार रहता हैं सब को. मुलाक़ात ए तबीब का

मुंतज़िर हैं सारे. ज़मीन के भगवान से इलाज को.

कराहता कोई. आहें कई नाम भगवान का लेते हैं

जाने कब किसकी दुआ इलाज की. कबूल हो जाए.

गर कोई सख्त जान. बीमारी को शिकस्त देता है

बीमार बचा तो. कोविड सेनानी तमगा मिलता है.

ख़ैरात खून की लेने की. लगती उसके पास कतारें हैं

बांट लेने प्लेटलेट. पैदा हुए हैं जो. उसके लहू में.

देकर यही प्लेटलेट कोरोना बीमारों को

जिंदा रखना चाहता है डॉक्टर बुझती ज़िन्दगी की लौ.

बचाना चाहता है ईमानदारी से. काल के गाल से

कई मरीजों की जिंदगी. यह धरती का भगवान.

गर हुआ कोई मरीज प्यारा खुदा को. शफाखाने में

शहीद हुआ तो रिश्ते सारे. मुलाजिम हुए शफाखाने के.

तरस जाते हैं घरवाले. मैयत की दीदार को

बात करना आखिरी वक़्त में दूर की बात होती है.

कैसे हुआ? कब हुआ? अभी तक तो ठीक था

कोई भी तसल्ली बक्स. जवाब नहीं मिलता.

सांस रुक गयी बस. सांस नहीं आने से

फेफड़े बेवफाई कर गए. अचानक मरीज से.

कम हो गया था लहू में. ऑक्सिजन का लेबल

ना जाने कितनी दवाओं का असर. कोई ना हुआ.

वो चाहे किसी भी. जात बिरादरी धर्म का हो

मैयत उठाएंगे जला देंगे. मुलाजिम शफाखाने के.

आगोश में कोरोना के आने वालों की गिनती. तो ऐसे चलती है

जैसे चढता हो गाँव के साहूकार का. बेहिसाब व्याज.

सरकार भी क्या. इंतेजामात खूब करती हैं

करती हैं घरों में बंद और इश्तहार बाहर लगवाती है.

मुलाकात यों को मिलने से. महरूम करती है

नज़रबंद करती है घर में. बगैर किसी जुर्म के.

बच्चे खेलने को. बड़े घूमने को तरस जाते हैं

बड़े छोटे सब को नज़रबंद रहने को. पाबंद करती है.

खेल और मिलने जुलने से महरूम घरों में बंध हैं

ऊस पर सितम है कि स्कूल आन लाइन चलते हैं.

मयस्सर नहीं होते सब को. मोबाइल और कम्प्यूटर

अगर हों भी किसी के पास. तो वाई फ़ाई नहीं होता.

कुछ के पास अब भी. नायाब मोडेल हैं मोबाइल के

उन में ये ज़ूम चेट वगैरह. प्रोग्राम नहीं चलते.

हर क्लास हर स्कूल स्मार्ट मोबाइल ज़रूरी है

माँ बाप को मजबूरन. नए मोबाइल लेने होते हैं.

बीच का तबका कहाँ से लाए. सब के लिए मोबाइल

घर में हो गर कम्प्यूटर. तो बड़ा रईस कहलाता है.

चादर खींचता ही रहता हैं सब कोने बराबर करने को

ये तो बीच रईस और गरीब के. पिसता रहता है.

जो भी कमा लाते हैं. कुछ घंटों में मेहनत करके

कमाई सारी. मोबाइल और वाई फाई ही खा जाते है.

रंगदारी खूब सरे आम. मोबाइल ऑपरेटर करते हैं

इन पर कोई धोखा धड़ी का मुकद् मा नहीं करता.

डाटा प्लान स्पीड दिखाते ज्यादा. आहिस्ता चलते हैं

नेट की स्पीड आधी मिलती है. आधे प्लान के बाद.

दुनिया के कलैंडर. सूरज की रफ्तार से बनते हैं

सारे मोबाइल ऑपरेटर. चाँद की हरकत पर फिदा हैं.

इनके लिए हर महीने में. दिन की गिनती बराबर होती हैं

महीना हो फरवरी या मार्च. दिन तो अट्ठाईस ही होते हैं.

नोकरी छुट्टी नहीं. काम घर से करना होता हैं

कुछ बेहद खुश तो. कई बेहद बेजार होते हैं.

काम करते थे ऑफिस में. आठ घंटे लंच के साथ

मुलाज़िम अब दिन रात के घर पर रह कर हो गए हैं.

कहर टूट पड़ता है. कई घर की ख़वातीन पर

जब खाने की हर दम. फ़रमाइश नई होती है.

इनकी नहीं होती कोई छुट्टी. किसी भी हालात में

व्यवहार सारे ले कर चलती हैं. अपने नाज़ुक कंधों पर.

खातून बराबर पिसती रहती हैं घर की चक्की में

अपने लिए इनके पास. कोई वक़्त नहीं होता.

अपने गमों का खयाल करने की इनको फुर्सत नहीं होती

हर एक पल इनका. अपना नहीं. पारिवारिक होता है.

व्यवस्था में. किसी अफ़सर की तरह काम करती हैं

घर की खिदमत में देती हैं गुलामों को मात.

नहीं होती हैं ये. सियासी पार्टी के नेता से कम

सभी से काम लेती हैं. सभी का काम करती हैं.

सीखनी चाहिए कला इनसे. सब को खुश रखने की

हमारे वतन के हुक्मरानों और अफसरों को इनसे.

जब हर घर में सब मर्द. हर दम मोजूद रहते हैं

हर शख्स अपने में. मसरूफ़ और संजीदा रहता है.

उस्ताद के क्लास में रहते. जैसे बच्चे खामोश रहते हैं

अफसर की मोजूदगी में. जैसे मातहत मुस्तैद रहते है.

काम कई गुना बढ़ जाता है. घर में मर्द के रहने से

कोविड को कोसती है नारियाँ. काम करते करते.

मुहब्बत पुख्ता और होती है लंबी नजदीकियाँ में

रिश्ते में आती है नई ताजगी. नजदीक रहने से.

दिखाई नहीं दी थी खूबियाँ कई. वर्षों से अपनों में

लगातार रहते-रहते साथ उनसे. दो चार होता है.

सोचता है फुर्सत में हर शख्स. अपने माझी के बारे में

मौका कहाँ होता है मयस्सर. गुफ्तगू ख़ुद से करने का.

किया है इंसान को नज़रबंद. इसीलिए कुदरत ने

पोशीदा राज़ अपनों के कई. से रूबरू होता है.

गलतियाँ याद आती है. शिद्दत से पुरानी

अफसोस और गुस्सा दोनों आते हैं. अपने फैसलों पर.

आता है कभी गुस्सा. जवानी की गल तियों पर

दोनों बेसाख्ता याद आते हैं. मुहब्बत और जिल्लत.

आता है चेहरा परी कोई याद. माझी से निकल कर

एक रील-सी घूम जाती है. गुजरी सुरमई शामों की.

खिलते जाते हैं अनगिनत फूल. यादों के पोथों पर

वो शायरी कविता और फिल्मी नगमे याद आते हैं.

मीर गालिब खुसरो साहिर शैलेंद्र राजेंद्र याद आते हैं

करते थे इस्तेमाल. मुहब्बत भरे खतूत लिखने में.

संजीदा गमगीन लबरेज़ मुहब्बत से. पुराने नगमे

गाया करते थे हम तरन्नुम से. किसी बाग़ के कोने में.

सूरत ए हाल ए तकरार में. या जुदाई की घड़ी में

बजा कर वही गीत. सुना करता था प्लेयर पर.

बजता हो वही नगमा. कभी कहीं किसी जगह

कर देती हैं यादें तन्हा. भीड़ में भी मुझे.

गाने की तरह पड़े-पड़े खाट पर. सुरमई शाम को

तलत. रफ़ी. कभी हेमंत दा बड़ी शिद्दत से याद आते हैं.

समझ नहीं आया था. मतलब जिनका कभी जवानी में

आज एक-एक लफ़्ज़ के. मानी याद हो गए हैं.

जिंदा हो जाते हैं यकायक. लफ्जों में बंधे रिश्ते

कैसे आए बाहर दिल. माझी की गलियाँ छोड़ कर.

बेहया दिल बेख़ुद है. गमगीन यादों की वादियों मैं

पुकारता भी है गर कोई. तो बड़ा नागवार गुजरता है.

दुनिया सिमट गई है. अब तो. मोबाइल के डिबिया में

शो कीन पाते हैं सज़ा जब. घर में रहने की.

वक़्त काटना मुश्किल होता है. तलब जदा के लिए

दर दर भटकते है. शोख तम्बाकू का पूरा करने को.

मुश्किल होता तलाश करना. तंबाकू का कर्फ़्यू में

कई बेवकूफ ना हरकतें होती हैं. इसकी तलाश में.

कभी हवालात में तो. कभी पुलिस के डंडे खाते हैं

कुछ नकद ले दे कर तो कभी. जमानत देनी होती है.

होने लगी है सहर. डरावनी सियाह गमगीन रात के बाद

चलो करें इस्तकबाल. गर्म जोशी से नई सुबह का.

आओ सब मिल कर. शुक्रिया अदा करें रब का

आओ नया अहद करें मास्क पहन कर दूर रहने का.

जो बिछड़ गए नामी गिरामी नजदीकी या दूर के

अपने पराए जो शहीद हुए खौफ़नाक कोरोंना काल में.

जन्नत नशीं हुए जो. रब से दुआ तस्कीन की करें

आओ बचा लाए ज़िन्दगी को. बेरहम मौत के साए से.

धो कर सेनेटीज़र से बार-बार हाथ. चेहरे पर नकाब

रखें दो गज़ की दूरी. दो गज़ ज़मीन का करके ख्याल.


By Vijay Kumar Nagar



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