झरोखे
By Sushant Saurabh
झरोखे के देहली पर
कुहनी टेक कर,
जब भी बैठता हूं,
तब सोचता हूं
ये बाहर की दुनिया
कितनी हसीन है, कितनी रंगीन है।
भीतर इतना उमस है,
बाहर कैसे ठंडी हवा है।
ऊपर आसमां के फर्श पर,
धीरे - धीरे फिसलता चांद।
जब मैं भीतर से, कोमलता से,
निहारता हूं।
शायद, कहीं और
कहीं बहुत दूर
कोई होगा जो,
कहीं भीतर से,
इसी कोमलता से
उसे निहारता होगा।
मैं उससे मिलना चाहता हूं।
गले लगाना चाहता हूं।
बातें करना चाहता हूं।।
पैरों से बंधे मोटे - मोटे जंजीर,
एड़ियों को जकड़े हुए है,
मुझे पकड़े हुए है।
पर मन मेरा आजाद है,
बाहर खेल रहा है,
आबाद है।
बड़ी विचित्र हैं,
ये झरोखे।
दो दुनिया को जोड़ती है
हमने जो दीवारें बनाई है,
उनको तोड़ती है।
अब, अगर तुम
किसी व्यक्ति को,
झरोखे से झांकते देखोगे
तो समझ जाना
वो तुम्हारी दुनिया को
अपनी तरह बनाना चाहता है।
या फिर,
अपनी दुनिया को
तुम्हारी तरह।।
By Sushant Saurabh

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