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जज़्बात

By Dr. Anuradha Dambhare



वजह मिले हमको तो हम भी खुद को बदले,

कोई वजह बनके आये तो सही हम यु ही बदल जाएंगे वक़्त के पहले।


एक आदत सी हो गयी हैं खुदकेही जज्बातो को हसीं मे उड़ाना, 

हसीं खुदपे आती हैं या उस वक़्त पर जो सब पलट के चला गया..

जताना तो सिख पाए नहीं बस सिख लिया खुदको सबसे छुपाना।


ख्वाईशो के तराजू मे खुदको तोलकर भी हाथ कुछ नहीं लगता,

आखिर क्या चाहती हैं ये किस्मत..

खुद की हक़ की चीज़ो को चाहकर भी दिल उन्हें छू नहीं पाता।


यु प्यार की चाहत रखकर ये दिल सपनो के कितने जाल हैं बुनता,

पर ये तो वक़्त का कमाल हैं जो कभी मेहेरबान हैं तो कभी बईमान..

कभी ये तकलीफे देके इस दिल को किस कदर हैं परखता..

तो कभी कोई दुआ बनके एक बारिश की तरह हैं बरसता।


मंजील को ढूंढ़ते ढूंढ़ते ना जाने हमने खुदको ही खो दिया,

आखिर क्या ढूंढ़ती रहती हैं ये आँखे..

बहते हुए इस वक़्त के हवाले खुदको  करके जैसे मानो हमने इस मंजील के सफर को ही गले लगा लिया।


By Dr. Anuradha Dambhare



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