जो तुम नहीं समझी
By Anant Srivastav
मैंने मुस्कराकर कहा —
"ठीक हूँ",
और तुम
मुस्कराकर मान भी गईं।
पर उस ‘ठीक’ में
कितनी टूटी रातें थीं,
कितने लहूलुहान शब्द,
जो बोले नहीं गए,
बस भीतर गूंजते रहे
— अधूरी प्रार्थनाओं की तरह।
तुमने
मेरे खामोश चेहरे को पढ़ा नहीं,
उस पर जमी उदासी की
धूल झाड़ी नहीं।
तुम सुन सकती थीं,
पर सुनना चाहा नहीं,
क्योंकि मेरी ख़ामोशी
तुम्हारी व्यस्त दुनिया को
थोड़ी देर रोक देती।
तुम्हारे पास समय था —
पर उत्तरों के लिए,
प्रश्नों के लिए नहीं।
तुमने कहा —
"हर कोई लड़ता है",
पर मैं
लड़ नहीं रहा था,
मैं गिर रहा था,
धीरे, चुपचाप,
अपनी ही चुप्पी की खाई में।
जो तुम नहीं समझी,
वह यही था —
कि मेरी मुस्कान
एक मुखौटा थी,
जिसके पीछे
मैं हर रोज़
थोड़ा-थोड़ा मरता रहा।
अब मैं नहीं हूँ,
और तुम कहती हो —
"काश, कुछ कहा होता।"
मैंने कहा था,
हर मौन में,
हर थरथराते स्पर्श में,
हर उस वक़्त जब
मैं बस
देखता रह गया।
काश...
तुमने समझा होता।
By Anant Srivastav

वाह भाई वाह