जीस्त -ए -बेरुखी
By Pratiksha
मैखड़ा वहाां अकेल,े पुरे जग को जैसे नाप ललया।
देख दृश्य सामने ऐसा,अपने स्तर को मैंने भाप ललया।
मेरे मात,ृ पपता, भाई तीनो सामने मेरे बैठे है,
ना नजर ककसी की मुझपे जाने क्यों ऐसे ऐठे है।
ये घर ना मेरा अपना है, मैं शख्स लगा अांजान कोई,
न ध्यान ककसी को मेरा क्यों? मैंइांसान हुकोई सामान नह ां।
चाह रह कुछ कहने की पर लफ्ज़ भी जैसे खफ़ा रहे,
ददल चीख रहा अांतरमन से, पर मुख शाांत हर दफा रहे।
अांश प्रेम का मेरे जब, मेरे भ्राता पे कुबाान हुआ,
मन अश्क़ सांभालेनयनों मे, क्यों ये दो मुखी व्यवहार हुआ।
ये कैसी पवचललत व्यथा मेर , मन मस्स्तष्क पे न मरेा काबूहै,
ये वक्त कोई दखु द छलावे सा, या जख्मो का कोई जादूहै।
बाररश जैसे अश्क़ बहे, बादलो सा भीतर गजान है,
ये के वल घातक समय नह , मेरे भपवष्य काल का मदान है।
हे मााँ! मुझे आपसे कोई लसकवा गगला नह ,ां
मुझे प्रेम करें कोई कैसे, मुझे खदु मे कुछ ऐसा लमला नह ां।
पर सुना था मााँका प्यार कभी, वजहो का मोहताज नह ां,
शायद मुझमे ह कुछ कलमयाां है, जो मैंमातृप्रेम का भाग नह ां।
इस ममता का, इस आाँचल का, अब तो मैं भागीदार नह ां।
मैं बाहर से आया मेहमान कोई, इस घर का पहरेदार नह ां।
ककसे सुनाऊ हाल – ए- ददल, जब अपने ह अजां ान हुए,
रोते, बबलखते अांधरेो मे, ये चेहरे भी बेजान हुए।
ये प्रचांड जख्म, वेदना अब, हर पल मुझे सताते है,
इससे अच्छी तो मौत सह , एक पल मे तो मर जाते हैं।
हााँ! नह ां चादहए जीवन अब, है अपनों से भी मोह नह ां,
मत्ृयुध्वनी का कारण हो, जीते जी तो तननक भी शोर नह ां।
एक रात सीने मे ऐसा, असहनीय ददा का लहर उठा,
पल भर मे सौ मौते हो, कुछ ऐसा वो कहर उठा।
मैंरोया और गचल्लाया भी, ये जख्म ना मुझसे सहन हुआ,
मेरे उन चीखो, अश्कों से, मेरा कमरा परूा सहम उठा।
पर शाांत हो गयी छण भर मे, मेरे अांदर कक वो हर आवाज़,
लगा जैसे मुक्त हो गया, हर ग़म से ये तन मन आज।
धीरे धीरे मन ने अब, धारण ककया पवकराल रूप,
छोड़ ये अबला, रोता मन, मस्स्तष्क बना पवष कालकुट।
थी धधक रह प्रनतशोधास्नन, मेर भीतर के शैतानो मे,
जैसे बना पवशाल सागर अस्नन का,लाशों के अांगारो से।
है उपज रहा एक मैला मन, इस उषामयी अांधेरों मे,
जो खीांच ले हर ननबाल तन को, हषारूपी सवेरों से।
इस अडडग घणृ ा का पहला प्रहार, होगा अचकू , होगा अभेद, हो गया यहााँअब नरसांहार।
प्रेम मे जो प्रथम था, उसकी मत्ृयुभी होंगी प्रथम।
धूमकेतुहोंगी शाांत, जब होगा अनजु का रक्त पात।
ये है कथन, ये है सांकल्प, ये है मेरा अांनतम वचन।
अपने लशकार के खोज मे था, हो रहा मन व्याकुल मेरा,
छत पर हुआ कफर आगमन, जहा खड़ा था अग्रत मेरा।
शाांत था हर अांग मेरा, थी तो एक नशृ ांश मुश्कान,
मौसम मे एक सचेतपन था, जैसे था उन्हें अवस्था का ज्ञान।
तीव्रता के साथ मैने, जोर का हमला ककया,
उस छणणक पल मे अनुज को, मनैं े छत से रुशवा ककया।
चीख उसकी कानो में, मदृ लु स्वर सी बज रह थी।
ददल मे ये नफ़रत की चादर, थम थम के छट रह थी।
धीरे -धीरे अांग उसका, जो जमीां पे जा रहा था,
मेरा ये ननकृष्ट मन अब, फुलेना समाां रहा था।
एक असीम नाद सांग, शर र उसका जा गगरा,
दो टुकड़े मस्स्तष्क के, सांपूणा रक्त धरा मे जा लमला।
इस भयावह दृश्य से, हवा ने मोड़ा आज रुख,
थी चारो ओर अब सनसनी, वीरान ननलमष भी था पवमुख।
एक शोर सांयोग वश, मेरे श्रवण मे जा लगा,
ये थी ध्वनन मेर अम्बा की, स्जनकी गोद से वांगचत रहा।
भूलोक को जो चीर दे, था चीख मे वो रौद्र रव,
एक कपकपी माहौल था, जो थरथरा दे मौन शव।
लड़खड़ाते, डगमगाते,बेसुध सी, पहुांची वो पास,
नैनो मे सैलाब ललए, देख रह वो सघन आकाश।
वेदना, असहाय स्वर मे कर रह थी वो पवलाप
एक पुत्र तो मर चूका था, दसू रा भी मर गया
ककस पाप की है ये सजा,क्यों हो रहा ये सवानाश।
“एक पत्रु तो मर चूका था, दसू रा भी मर गया”।
उनका ये शब्द ददल को, सौ बार छल्ल कर गया।
दो कदम पीछे अपने आप, जाने मैं कै से हो गया!
ये झूठ है! ये सच नह ां, मेर मा को क्या हैहो गया?
नह ां! मैंस्जन्दा हु, मैंकैसे मर सकता हु?
अभी तो मेर स्जांदगी मे, बहार आने बाकक थे।
अभी तो बांजर बाग़ मे,फूल णखलने बाकक थे।
मैंरो रहा हुदेखो मााँ, क्या साये भी कभी रोते है?
मैं, मैंस्जन्दा हुदेखो इधर, सायेतो ऐसेनह ां होते हैं।
मााँ! अभी तो मुझे आपके, आाँचल मे सर रख के सोना हैं।
आपके और पापा के साथ, मुझे सपना कई सजोना हैं।
करदो मेरा ये दखु ी मन, चाहे तो मुझको मार लो,
पर इस तरह इस रूह को, युजीते जी ना मार दो।
गगर पड़ा ये रूह जमीां पे, मेरा तन भी अब कहााँ रहा?
प्रेम को तरसा जो हर छण, अब वो मन भी कहााँ रहा?
प्रेम मे तरसते आाँखों कक, कब इस्ल्तज़ा परू हुई?
मत्ृयुका कारण भी तो, मरेे अपनों कक दरु हुई!
मैं जब रो रहा था, मर रहा था, वो कहााँ ककसको याद हैं!
रूह जीते जी बबााद था, अब मर के वो आबाद हैं।।।।
By Pratiksha

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