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जीवन‌ को समझना मौत हैं

By Aditya Nandkumar Garde


हमने शहरों में चेहरों की भीड़ की शांति देखी,

गांव में उसी भीड का शोर देखा, 

जैसे रेगिस्तान की रेत में,

गुम होती परछाईयाँ देखी। 


अपने ही देश में युद्ध देखें, मौत के जुलूस देखें, 

सरकार की चेहरों पर, बेगुनाही के नकाब देखें। 


इतिहास की किताबों में, शहीदों के पाठ पढ़ें, 

वर्तमान की योजनाओं में, भविष्य की साजिशें देखी। 


हमने प्रेम के नाम पर, सौदे होते देखें, 

धर्म के नाम पर, सरकार के खेल देखें। 


दरवाजों पर टूटे ताले देखें,  आंगन में बच्चों की चींखे देखी, 

आसमान में उड़ते पंछियों की, कटती पंखों वाली यादें देखी। 


हमने जीवन के भीतर, घने अंधेरे में कब्र देखी, 

जहाँ रौशनी को खुद, सवालों के कंकाल छोड़ते देखा। 


हमने समय को, घड़ी की गति से दबते देखा, 

और उम्मीद को, सूखे कुएँ में तैरते देखा। 


हमने इंसानों को समंदर तक जाते देखा,

समन्दर मैं सिर्फ सन्नाटा तैरता पाया। 


हमने चेहरों के पीछे ये हजारों चेहरे देखें,

पर किसी में भी, इंसान का चेहरा नहीं पाया। 


हमने जीवन को हर मोड़ पर लड़खड़ाते देखा,

उसकी आँखों में उसके ही डर का साया देखा। 


जब इतनी सारी तस्वीरें, 

अपनी आँखों में समा लिए,

इतने सारे रंग अपने अंदर भर लिए। 


तब जाके समझ में आया की,

सिर्फ देखना ही जीवन है,

और जीवन को समझना मौत हैं। 


By Aditya Nandkumar Garde


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