जीवन का षड़यंत्र
- Hashtag Kalakar
- Dec 1, 2025
- 1 min read
By Mitul Chauhan
जब जब सपनों के पीछे दौड़ना चाहा तो वास्तविकता ने मुझे हराया,
जब जब अपनों के बारे में सोचना चाहा तो खुद को अपनों से मीलो दूर पाया,
जब जब मन ने कोमलता को पाना चाहा तो साथ चला घिनौनेपन का साया,
ये जीवन का षड़यंत्र नहीं तो और क्या है ।
जब जब सत्य को पाना चाहा, तो माया ने लुभाया,
जब जब शांति को जीना चाहा तो क्रोध ने सिर फिराया,
जब जब दुनिया से दूर जाना चाहा तो रिश्तों को और गहरा पाया,
ये जीवन का षड़यंत्र नहीं तो और क्या है ।
चक्रव्यू आया तो मुझे अभिमन्यु बनाया,
त्रेता में खुद को बाली रूप में पाया,
कुरुक्षेत्र मे मुझसे धंसा पहिया उठवाया,
कलयुग में प्रकृति रूप में जलाया,
ये जीवन का षड़यंत्र नहीं तो और क्या है ।
By Mitul Chauhan

This one is 🔥, keep going bhaiya
Keep it up mitul
I love this one 🤩
what a poem! nice one brother