जिक्र
By Sachin Madhukar Gote
ऐसे गुमसुम है के कुछ हुआ ही नहीं।
खामोशी से यूंही शाम, गुजरती रही।
रात रोशन है के तुम महकते रहे,
वरना महफिल में कुछ मजा ही नहीं।
आह भरकर जो तुमने मुड़के देखा एक नजर।
धड़कनों ने फिर दिल की सुनी ही नहीं।
वो जो जिक्र था, जिसमें शामिल तुम रहे।
एक तेरे नाम के सिवा हमने कुछ कहा ही नहीं।
जो भी कामिल था, एक पल में मुक्कमल हुआ।
और फिर जीने के लिए, कुछ बचा ही नहीं।
By Sachin Madhukar Gote

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