जानवर और इंसान
By Meenali Gulati
क्यों शहर में लोगों के बीच जानवर आ जाते हैं
इतने लोगों की आबादी में तबाही मचाते हैं,
शेर ,चीते, बंदर और नीलगाय ,सड़क पर आ जाये तो,
घबराकर हम सब डर जाते हैं।
लाठी पकड़ें की गोली मारे
ऐसे ख्याल आ जाते हैं,
हम लोग क्या करें और क्या ना करें?
क्या सच में हम सब जान पाते हैं?
आजकल तो कुत्तों ने शेरों का रूप धारण किया है
इतने मासूमों को काटकर तहलका मचा दिया है,
कौन सही कौन गलत यह बहुत गहरा मसला है।
काश हमें पता होता की
क्या करें क्या सही रस्ता है?
इन सवालों के जवाब मांग रही हूं
अपने और जानवरों के डर को जान रही हूं।
क्या हमने घेरा है
जानवरों का डेरा,
अब किस मुँह से कह रहे
यह मेरा , यह मेरा।
किसी को पता है तो ज्ञान दो
सही मायने में जीव को मकान दो।
By Meenali Gulati

Amazing!
True, Brilliant poem
Thoughtful words - emotional and brilliant
Very well written! 🤩
मीनाली गुलाटी की कविता "जानवर और इंसान" एक अत्यंत प्रासंगिक और चिंतनशील विषय को उठाती है, जो शहरी विकास और प्राकृतिक जीवन के बीच संतुलन के संबंध को दर्शाता है। गुलाटी की सबसे बड़ी प्रशंसा इस बात के लिए की जानी चाहिए कि उन्होंने एक जीवंत विषयवस्तु को अत्यंत मार्मिक और प्रश्नवाचक रूप में प्रस्तुत किया है, जहाँ सह-अस्तित्व की चुनौती को दर्शाया गया है।
कविता की शुरुआत ही एक चौंकाने वाली तस्वीर से होती है: "क्यों शहर में लोगों के बीच जानवर आ जाते हैं," जो बढ़ती मानव बस्तियों और प्राणियों के निवास स्थान के साझा होने की स्थिति को दर्शाती है। यह सवाल मानव और पशु जीवन के बीच उत्पन्न होने वाले टकराव को रेखांकित करता है। यह…