जादूगर
By Dhruwa Shankar Prasad
जादूगर वाले बहुत शो देखे हैं मैंने
रुमाल से कबूतर निकाल देना
नोटों की बारिश करा देना
पानी को गायब कर देना
टोकरी से खरगोश निकाल देना
इंसान को हवा में उड़ा देना ...
बहुत मजा आया हर बार मुझे
मगर लबों पर लब्जों के आने से पहले उनकी आहट जान लेना
नम आंखों की बोली का झप्पी से जवाब देना
कदमों के जवाब देने से पहले गोद में उठा लेना
बालों को सहला कर चिंता गायब कर देना
पीठ थप थपाकर जोश में जान डाल देना
हारी बाजी को जीत में बदल देना
कम पैसे से बड़ी खुशी खरीद लेना
छोटे लम्हों में बड़ा चैन खोज लेना
रद्दी से माॅडल बना देना
हर दुख में सुख का एहसास करा देना...
इनमें जो जादू था वो कभी भूल न पाया
इनमें जो मजा था वो कहीं और न पाया
वो जादूगर हमारे साथ रहते थे
हमारे पास रहते थे
उनको हमसब बाबूजी कहते थे !
By Dhruwa Shankar Prasad

Nice poem
True🙏
Very nice poem
Very nice 👍