जाड़े में
By Sanjay Kumar Upadhyay
सूरज ने फिर आँखें खोली, जबरन जैसे जाड़े में,
कलियों ने चिड़ियों से बोला, कुछ गीत सुनाओ जाड़े में,
चलने लगी हवा पुरवाई, शीतलहर सी जाड़े में,
कुहरे ने भी ली अंगड़ाई, चिर यौवन सी जाड़े में,
मुर्ग़ा बाँग लगा भरने फिर, सुभा सुभा इस जाड़े में
पशुओं ने फिर चारा माँगा, आँ....... करके इस जाड़े में,
दादा ने कुल्ला कर बोला, उठ जाओ सब सुभा हुई इस जाड़े में
फिर ,शुरू हुई दादी की मथनी, घड़ घड़ करती जाड़े में ,
सब बच्चों ने आँखें खोलीं, लगे दौड़ने जाड़े में,
दादी ने ग़ुस्से से बोला, पहले खाओ फिर भागो तुम जाड़े में,
खापीकर जब बाहर झांका, इक जंग छिड़ी थी जाड़े में,
जोश में आती धूप थी उपर, कभी धुँध थी जाड़े में,
द्वंद अहम का चलता रहता, धूप धुँध सी जाड़े में,
जीवन में दोनों ही चहिये, नहीं मज़ा हैं सिर्फ़ धूप का बिना धुँध के जाड़े में......!!!!
By Sanjay Kumar Upadhyay

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