जा रहे हो, आओ दरवाज़ा खोल दू ।
By Ishika Kachhwaha
जा रहे हो? आओ दरवाज़ा खोल दू । कुछ सामान रखा हो तो लेते जाना, कुछ मेरा तुम्हारे पास हो तो देते जाना । गैर का रखने की आदत नहीं हैं मेरी, कुछ अपना कुर्बान करदू फितरत नहीं हैं मेरी । तुम्हारा पता लिखा हो कही तो मिटाते जाना, मेरी दीवारों में अपने अफ़सानों को छुपाके मत जाना, जो लौट जाए उसे पलट के देखना तौहीन हैं मेरी बीती गलियों मे लौटना चाहत नहीं हैं मेरी । कुछ खाना चाहों तो कहो बनादू, कुछ सुन्ना चाहो तो कहो जतादू, कोई भूखा जाए मेरे घर से ऐसी परवरिश नहीं मेरी, बदले में कुछ मांगू ऐसी ज़रूरत नहीं हैं मेरी । चलो, जा रहे हो? आओ दरवाज़ा खोल दू ।
By Ishika Kachhwaha

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