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- Hashtag Kalakar
- 43 minutes ago
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By Khushbu Vandawat
ऐ मेरे मन, मैं पढ़ना चाहती हूं
मेरे सपनों को पंख दे पाओगे तुम?
खुले आसमान में उड़ना चाहती हूं
ऐ मेरे मन, मुझे खुला आसमान दे पाओगे तुम?
तिरंगे की तरह लहराना चाहती हूं
ऐ मेरे मन, क्या हवा बन पाओगे तुम?
मैं खुलकर मुस्कुराना चाहती हूं
ऐ मेरे मन, मेरा डर मिटा पाओगे तुम?
मैं अपने लिए लड़ना चाहती हूं
ऐ मेरे मन, मुझे हिम्मत दे पाओगे तुम?
ऐ मेरे मन, तू क्यों इस दुनिया की बातों में आता है
क्या मेरे लिए, ऐ मेरे मन, आज़ाद पंछी बन पाओगे तुम?
कुछ सवाल हैं मुझसे, ऐ मेरे मन
क्या इनका जवाब खुद को दे पाओगे तुम?
ये आवाज़ है तुम्हारी, ऐ मेरे मन
अपनी आवाज़ खुद सुन पाओगे तुम?
By Khushbu Vandawat

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