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जवाब अभी बाकी हैं

By Khushbu Vandawat


‎ऐ मेरे मन, मैं पढ़ना चाहती हूं

‎मेरे सपनों को पंख दे पाओगे तुम?

‎खुले आसमान में उड़ना चाहती हूं

‎ऐ मेरे मन, मुझे खुला आसमान दे पाओगे तुम?

‎तिरंगे की तरह लहराना चाहती हूं

‎ऐ मेरे मन, क्या हवा बन पाओगे तुम?

‎मैं खुलकर मुस्कुराना चाहती हूं

‎ऐ मेरे मन, मेरा डर मिटा पाओगे तुम?

‎मैं अपने लिए लड़ना चाहती हूं

‎ऐ मेरे मन, मुझे हिम्मत दे पाओगे तुम?

‎ऐ मेरे मन, तू क्यों इस दुनिया की बातों में आता है

‎क्या मेरे लिए, ऐ मेरे मन, आज़ाद पंछी बन पाओगे तुम?

‎कुछ सवाल हैं मुझसे, ऐ मेरे मन

‎क्या इनका जवाब खुद को दे पाओगे तुम?

‎ये आवाज़ है तुम्हारी, ऐ मेरे मन

‎अपनी आवाज़ खुद सुन पाओगे तुम?

By Khushbu Vandawat


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