“जरूरत”
By Renu singh
रहिए अपनो के आस पास जरा
कि किराये दारो की जरूरत नही होती....
जो नजर ए इनायत बनी रहे उनकी तो,,, शिकवो की गुंजाइश नही होती।
सुना है बहुत करीब होते है लोग
जब चर्चे बाजार मे गुमान के होते है...
क्यो न एक गुनाह हम भी करे कभी,,
कहते है अक्सर फरिशतो की बेगुनाही की सुनवाई नही होती।।।
सिर पर रखे बूढे हाथकी ये लकीरे, बरसो पूराने बरगद की सी छांव देती है,,
मौजूदगी हो गर सायो की उनकी
वहां तालो की गुंजाइश नही होती। ।
By Renu singh

Comments