जब मैं घर आता हूँ
By Himanshu Kumar
हर बार घर जाता हूं
हर बार घर जाता हूं
कभी यह कभी वो कभी घर का रंग बदला लगता है
सब कुछ समान रहे फिर भी,
पता नहीं यह घर अब कुछ अलग लगता है
घर की चौखट
मां की रोटी
बाप का प्यार वही है
कहने को तो हर एक इंसान सही है
घर नहीं लगता है मैं ही बदल गया
ज़िंदगी में आगे बढ़ते समय अपनो से बिछड़ गया
दोस्ती की यहाँ कोई कमी नहीं है
पर मां की ममता जैसी बात नहीं है
घर से बिछड़ कर मैंने इसी जगह को अपना घर बना लिया
कभी रोके
कभी सोके
कभी यादों को ही संजोह के
मैंने घर से बिछड़ कर इसी जगह को अपना दूसरा घर बना लिया
जवानी को सर तने
अपने घरवालों को बूढ़ों ना होते देख सकता
ना वो घर की जगह बदली है ना वो घर की सड़क बदली है
बदला तो शायद बस ये है की..
घर बदला बदला कहते कहते मैं ही पूरा बदल गया....
By Himanshu Kumar

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