जन आंदोलन
By Sanjay Kumar Upadhyay
जो कट रहे हों शीश गरल के,
यूँ समझना आतिशों का बस धुँआ है,
जो दब गई आवाज़ जन की,
यूँ मान लेना आंसुओं का बस कुँआ है,
ना चाह के जो चल पड़ा हो,
तुम लाख कीलें गाड़ लो वो कब रुका है,
बस मियाद दो पल आपके इस शब की,
ना चाह के भी ये उजाला कब रुका है,
जो बात करते थे प्रभु श्रीराम की,
अब सर क्यु उनका एक मानव पे झुका है...!!
By Sanjay Kumar Upadhyay

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