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जंगल की आग

By Abhishek Kumar 'Shahi'


उत्तर-पूर्व के जंगलों से लगी हुई बस्ती के बीच एक शीशमहल खड़ा था।बस्ती के लोग बड़े आश्चर्य से उसको देखते।जहां के लोग आज भी सरोवर की परछाई में अपना चेहरा देखते हों उनका शीशमहल पर अचरज करना लाजमी है।जब भी कोई गाड़ी उस महल के अंदर या बाहर जाती आदिवासी बच्चे उसके पीछे दौड़ते और गाड़ी से आगे निकलकर शोर करते हुए अंदर बैठे हुए लोगों को ये बताते कि उनके पांव जमीन पर रबड़ के पहियों से तेज चलते हैं। बस्ती के लोग उन्हें गलत समझकर उनका नुकसान न करें इसलिए वो उनके बच्चों को थोड़े कपड़े और खाने की सामग्री देकर शहर का प्रलोभन देते रहते । शायद इसी प्रलोभन में अंधा होकर किसी ने कुल्हाड़ी उठाई होगी औऱ अपने जंगल को काटकर शहर बना दिया होगा।

उनके हावभाव से ऐसा लगता था कि वो किसी विशिष्ट उद्देश्य से वहाँ आए थे। वो आपस मे बातें भी इतनी धीमी करते कि अगर एक कान को बात सुनानी हो तो दूसरे कान को भी कानों कान खबर न हो। पर एकदिन अचानक उनकी खिड़कियों से शोर सुनाई देने लगा। निराशा में मेज पर एकसाथ हाथ पटकते हुए पांच-छः नौजवान एक अधेड़ उम्र के व्यकि की ओर देखते हुए बोले "डॉ. कुंडु वो फिर से लापता हो गए , अचानक सारी स्क्रीन से गायब हो गए।" "आग इतनी भयावह है कि हरे-भरे विशालकाय वृक्ष मिनटों में खाक हो जा रहे हैं ; शेर ,चीता ,तेन्दुए के शिकारी पांव भी इस विभीषिका के आगे घुटने टेक रहे हैं , आसमान में उड़ते परिदों को ये लपटें जमीन पर गिराकर भस्म कर दे रही है ,फिर कैसे? वो कैसे बच जाते हैं हर बार ?.कहाँ गायब हो जातें हैं ? हर साल गर्मियों में इन जंगली बदबूदार लोगों के बीच हम महीनों इंतजार करते हैं जंगल में आग लगने का, हजारों कैमरे , सेंसर लगवाते हैं ,इस बार तो ड्रोन भी लगवाया था, पर फिर भी वहीं के वहीं हैं , कुछ पता नहीं है हमें। साकेत! वो मानव विकास की पहेली को सुलझाने की अहम कड़ी हैं , और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण कड़ी हैं हमारी जिंदगी के लिए , वो मिल गए तो हम करोड़ो कमाएंगे; किताबों , अखबारों , पत्रिकाओं में छपकर अमर हो जाएंगे , पर न मिले तो कंपनी बार-बार इतना पैसा डुबाकर ये जुआ नहीं खेलेगी। हमें उन्हें ढूंढना ही होगा" डॉ. कुंडू झुँझलाते हुए बोल रहे थे। चिंता में उनका चेहरा ऐसा लाल हो रहा था मानो जंगल की आग की आंच उनतक भी पहुंची हो। व्याकुल होकर हॉल का चक्कर काटने लगे। तभी साकेत बोल पड़ा "श्रीमान! अब एक ही उपाय है कि अगली बार हम उस जंगल में जाकर उनका पता करे"। "वो जंगल विचित्र और विषैले जीवों से भरा है । ऐसी -ऐसी रहस्यमयी जगहें हैं उसके गर्भ में कि बड़े से बड़ा विमान इसके आसमान से गायब हो जाता है और मलवा तक नहीं मिलता। और हम तो उनकी भाषा भी नहीं समझते। उधर जाना खतरे से खाली नहीं है" साकेत के पास बैठे डॉ. नैनीवाल का डर तजुर्बा बनकर बोल रहा था। दरअसल हम जंगलों से इतने दूर हो गए हैं कि जंगल हमें डराने लगे हैं। वरना जंगल वही है जहां इमारतों की ख्वाइशें अभी नहीं पहुँची है , जहाँ पहाड़ों के पत्थर अभी सड़कों में नहीं लगे हैं , जहाँ असीम शांति है ,जंगल के इसी शांत गर्भ में ध्यान लगाए ऋषिओं के कंठो से सहसा वेदों का ज्ञान-धार फुट पड़ा होगा ,इन्हीं पेड़ों के बीच कहीं व्याकुल सिद्धार्थ ने आसन लगाया होगा और बुद्ध बन गए होंगे , इन्हीं गिरिप्रस्थों के बीच कहीं "ॐ शांति ॐ" कहा गया होगा। पर हमारे कानों को कोलाहल की ऐसी आदत पड़ चुकी है हर सन्नाटा हमें भीतर तक डरा देता है। "अरे विज्ञान ब्रह्माण्ड के रहस्यों से पर्दा उठाने में लगा है और तुम इस जंगल के मामूली रहस्यों से डरते हो । सारी टेक्नोलॉजी लगा देंगे हम पर इस गुत्थी को सुलझा कर रहेंगे। आखिर दुनिया को पता चलना चाहिए कि हम बंदर से इंसान बने कैसे!और भाषा समझने की चिंता मत करो इसी इलाके का एक भाषाविज्ञानी है जो अभी आयोध्या में भूगर्भ वैज्ञानिकों के साथ काम कर रहा है , उसे अपने साथ रख लेंगे ,इनलोगों को समझने में वो हमारी मदद करेगा। चलो-चलो सामान समेटो और अगली गर्मी की तैयारी में लग जाओ ,इस बार हम खाली हाथ नहीं जाएँगे" डॉ.कुंडु ने अपने साथियों को हौसला दिया।





यूं तो दुनिया के लिए हमने अपनी कई कागज़ी पहचाने बना रखी है। पर जब कभी एकांत में बैठकर खुद पर मनन करते हैं तो आभास होता है कि हमारी पहचान वो तो नहीं जो कागज के एक छोटे से टुकड़े पर प्लास्टिक की परत चढ़ा कर सरकारी मुहर के साथ हमें थमा दी गयी है। फिर हम कौन है जो खुद को नहीं जानते पर ब्रह्मांड को समझने की जिद पर अड़े हैं। ये सवाल हमें इतना कचोटता है कि हम जमीन खोद कर सदियों पुराने मुर्दों को निकालने लगते हैं ,पीढ़ियों पहले ध्वस्त हुई इमारतों के अवशेष टटोलने लगते हैं ,जंगलों को छानने लगते हैं ,पहाड़ों के खोह में उकेरी आकृतियों को निहारने लगते हैं ,खण्डहर खंगालने लगते हैं , हस्तलिपियों को पढ़ने लगते हैं । और सबसे एक ही सवाल पूछते हैं "आखिर हम कौन हैं?"। इन्हीं हस्तलिपियों को पढ़ते-पढ़ते वेदों के किसी पन्ने पर हमें लिखा मिल जाता है "अहम् ब्रह्मास्मि" "मैं ब्रह्म हुँ"। फिर हम कांधे पर हथियार उठाते हैं औऱ चिंघाड़ते हुए आसमान को बताते है कि "मैं ही ब्रह्म हूँ"। जिस धरती से हम अपना अस्तित्व पूछ रहे थे ,उसपर अपना आधिपत्य समझने लगते हैं। और कांधे पर हथियार लिए ऐसे कई उन्मादी ब्रह्म एक दूसरे से टकराते हैं और नदियों ,जंगलों ,पहाड़ों ,पशु-पक्षियों सहित खुद का सर्वनाश कर फिर जमीन में दफ्न हो जाते हैं।अगली पीढ़ी फिर उस जमीन को खोद कर उन मुर्दों में अपना अस्तित्व ढूंढती हैं। जब कुछ नहीं मिलता तो हताश होकर नास्तिकता के प्रबल स्वर में बोलती है कि ब्रह्म बस कल्पना है जो हैं बस हम ही हैं। मतलब दूसरे रास्ते से हम फिर खुद को ब्रह्म मान लेते हैं। ये एक चक्र है जिसकी परिधि में न जाने हम कब से भटक रहे हैं ,और ब्रह्म बीच में बैठा कहीं हमारे दम्भ पर कभी मुस्कुरा रहा है तो कभी हमारी मूर्खता पर आँसू बहा रहा है।

इसी तरह मानव अस्तित्व के नाम पर खुद की खुदगर्जी ढूंढ़ने डॉ. कुंडु का दल जंगल की ओर कदम बढ़ा चुका था। तंबू गाड़ दिए गए। बड़ी-बड़ी दूरबीनों और कैमरों से एक-एक हलचल पर बारीक नजर रखी जाने लगी। "सर! सर! इधर आइये, उन बच्चों को देखिए जरा " साकेत बड़ा अधीर होकर स्क्रीन दिखाने लगा। "हे भगवान ! ये तो 'कोरिवाला'(रसेल वाइपर) है , बिजली की तेजी से हमला करता है ,कैसे खिलौने की तरह पकड़ रखा है उसे , बच्चें हैं या शैतान" डॉ. नैनीवाल की आँखे फ़टी रह गयी। "हां, नैनीवाल हमारे बच्चे तो छिपकली और तेलचट्टे(कॉकरोच) देखकर डर जाते हैं " डॉ. कुंडु ने सहमती जताते हुए कहा। "कॉकरोच से तो नैनीवाल सर की बीबी भी डरती है और बीबी से नैनीवाल सर।" साकेत के इस चुटीले अंदाज पर तंबू में ठहाका गूंजने लगा। "श्रीमान इन्हें आसपास के पौधों और बुटियों की सारी जानकारी होती है जिससे ये हर जहर का उपचार कर लेते हैं इसलिए ये नहीं डरते हैं सांपो से" भाषाविज्ञानी संथाल मीणा बोले। "यही सब जानकारियां जुटाने तो हम यहाँ आएं हैं मीणा" डॉ. कुंडु गंभीर होकर बोले। वो जंगल पहुँच तो गए थे पर मंजिल अब भी उनसे बहुत दूर थी। क्योंकि प्रयोगशालाओं में सूक्ष्मदर्शी यंत्रो से पत्तों को देखकर पेड़ का नामकरण कर देना आसान है और पर जंगल को उसके असली स्वरूप में जानना मुश्किल है। यहाँ अगर रास्ता भटक गए तो नया रास्ता ढूंढना मुश्किल हो जाता है फिर कोई जीपीएस काम नहीं देता। वो इन बातों को अच्छी तरह समझते थे इसलिए धैर्य से मंजिल का इंतजार कर रहे थे पर किस्मत उनके साथ नहीं थी। "सर! जून भी बीतने को आया है ,और एक पत्ता तक नहीं जला ,कब तक हम यहां ऐसे बैठे रहेंगे ,एक बार बारिश शुरू हो गयी तो हमें फिर से खाली हाथ ही जाना होगा "साकेत बोला । "हर साल तो ये जंगल जलता है , पता नहीं इस बार क्या हुआ ! कोई बात नहीं ,हम आदिमानव युग में तो है नहीं कि पत्थर घिस कर चिंगारी निकालना पड़े। दो दिन इंतजार करते हैं खुद नहीं लगी तो हम आग लगा देंगे ,पर खाली हाथ तो नहीं जाएँगे इस बार " डॉ. कुंडु का कुटिल दिमाग चलने लगा। "पागल हैं आपलोग! जंगल में आग लगाने का मतलब समझते हैं , हजारों पेड़-पौधे और पशु-पक्षी झुलसकर खाक हो जाएंगे । ऐसा पाप करने के बारे में आप सोंच भी कैसे सकते हैं ! क्या इसलिए यहाँ आये हैं आपलोग" संथाल मीणा उनकी कुटिलता पर भड़क गए। "अरे जनाब! वो तो हर साल झुलसते हैं ,जंगल में जो ताकतवर होता है वही राजा होता है औऱ वो कुछ भी कर सकता है । और इस वक्त राजा हम हैं। इतना बड़ा काम करने निकले हैं दो-चार जंगली जानवरों का शिकार कर लेंगे तो कौन सी आफत आ जायेगी! औऱ ऐसा नहीं है हमें जानवरों से लगाव नहीं कई जानवर हमने चिड़ियाघर को दान किए हैं , घर में भी दो कुत्ते पाल रखे हैं पर जानवरों के लिए मानव विकास तो रुक नहीं सकता" डॉ. कुंडु बोले। "जेलों में भी बहुत से इंसान रहते हैं पर उसे इंसानी जिंदगी तो नहीं कहते ? खैर मैं आपको समझा नहीं सकता पर इतना जान लीजिए आपके इस काम में मैं साथ नहीं हूं और अगर आप कुछ भी गलत करते हैं तो आपको रोकने का हर संभव प्रयास करूंगा" संथाल मीणा की तल्खी बोल पड़ी। "जंगली जानवरों को शहर के चिड़ियाघर में बंद कर देने से वो शहरी नहीं हो जाते कुंडु साहब , मैंने पहले ही कहा था कि इन जंगली लोगों का भरोसा मत कीजिये ,सारे किये कराए पर पानी फेर दिया न" डॉ. नैनीवाल बोल पड़े। "आप थोड़ा संयम से बोला कीजिये , मैं उन्हें मना लूंगा ,सब अपना-अपना काम जारी रखो" डॉ कुंडु ने डॉ. नैनिवाल को समझाते हुए कहा। जंगल इतना घना था कि नदियों के अलावा वहां किसी को मालूम नहीं कि उनके ऊपर आसमान भी है पर इनकी बातों को जैसे आसमान सुन रहा था। भोर के चार बज रहे थे , डॉ. संथाल के साथ रातभर माथापच्ची करके सब सो रहे थे कि पेड़ों की डालियाँ आपस में टकराने लगी। तंबू के खूंटे उखड़ने को व्याकुल होने लगे। आसमान दहाड़ने लगा। सब हड़बड़ाकर उठे और सामान समेटने लगे। तभी आसमाँ से इन्द्रवज्र चला और पास एक पेड़ से टकराया । उंगलियां कान बंद करती उससे पहले ही साकेत हांफते हुए बोला "सर बिजली गिरने से बाहर आग लग गयी है हमें जल्दी नदी को ओर निकलना होगा"। "पर इस इलाके में तो कभी आग लगती नहीं थी ,आग तो हमेशा उस तरफ लगती है" डॉ. कुंडु आश्चर्य से बोले। "जंगल है सर कहीं भी कुछ भी हो सकता है, इतना वक्त नहीं है ,चलिए "साकेत बोल पड़ा। पर जंगल की आग शहर के अफवाहों की तरह फैलती है। जबतक ये बाहर निकलते तबतक आग की लपटें आसमानी बिजलियों से आंख मिला रही थी। ये बुरी तरह घिर चुके थे। "मीणा तुम तो इन जंगलों को अच्छी तरह जानते हो बताओ! कोई रास्ता बताओ?" डॉ. नैनीवाल का कलेजा मुंह को आने लगा। लपटों के तेज में सबके चेहरे पर मौत का खौफ़ साफ-साफ पढ़ा जा सकता था। "लगता है वन कि देवी हमसे काफी रुष्ट है ,झुलसकर मरना ही एकमात्र रास्ता है" डॉ. संथाल पश्चाताप के स्वर में बोले। डॉ. कुंडु बाहरी मदद के लिए संपर्क करने लगे। पर ये शहर से इतने दूर थे कि बाहरी मदद सिर्फ दुःखद खबर छापने के लिए ही पहुँच सकती थी। जैसे-जैसे एक-एक पेड़ जलकर जमीन पर गिरने लगा वैसे-वैसे उनके उम्मीदों की शाखाएँ भी टूटने लगी। सारे आधुनिक उपकरण पास थे पर जिंदगी का रास्ता कोई नहीं बता पा रहा था।मानव अस्तित्व ढूंढने निकले थे, अपना अस्तित्व मिटने वाला था। तभी काल के समान कुरूप ,देवदार की तरह ऊंचे कद के सात-आठ आदिमानव यक्ष की तरह उनके सामने प्रकट हो गए। सर पर तिनकों का मुकुट ,जांघो पर पत्तों का वस्त्र ,कांधे पर तीर-कमान औऱ हाथों में बरछे। उन्होंने आपस में कुछ संकेत किया देखते ही देखते डॉ. कुंडु के दल को घेर लिया। "लो इनके पीछे-पीछे हम मौत के मुंह तक आ गए और ये अब आएं है ,चलो आग में झुलसकर मरे उससे अच्छा है कि ये मार दें"साकेत बोला। "कोई भी मूर्खता मत करना । ये हमारी मदद के लिए आये हैं " संथाल मीणा बोले। विश्वास तो किसी को नहीं हुआ पर उसके अलावा कोई चारा भी नहीं था। डॉ. संथाल घुटनों पर बैठे और आदिमानवों को कुछ संकेत किया जैसे वो उनकी भाषा समझते हों। पलक झपकते ही उन्होंने कुंडु दल को कंधों पर उठाया और लपटों को पीछे छोड़ इस पेड़ से उस पेड़ छलांग लगाने लगे। मिनटों में वो पहाड़ की चोटी पर पहुँच गए। ये सब इतनी तेजी से हो रहा था कि कुंडु दल का दीमाग शिथिल पड़ गया था। आदिमानव उन्हें एक गुफा में ले गए जहां रौद्र रूप धारण किये एक देवी की मूर्ति खड़ी थी ,वो इतनी जीवंत थी जैसे रक्तबीज का रक्त पीने को खप्पड़ लिए देवी कालिका हो या महिषासुर मर्दन को व्याकुल देवी रणचंडी। उनका सरदार डॉ. संथाल को कुछ संकेत दिया। संथाल ने अपने साथियों को बताया कि उनकी देवी किसी बात से बहुत क्रुद्ध है इसलिए जंगल में आग लगी है , वो बलि के लिए जानवर ढूँढने जा रहे हैं ,बलि देने के बाद वो कुंडु दल को नदी के उसपार छोड़ आएंगे। आदिमानव गुफा छोड़कर निकल गए। डॉ. कुंडु गुफा की पड़ताल करने लगे। उन्हें इस बात का बड़ा आश्चर्य था कि इतने भव्य गुफ़ा का पता इन आदिमानवों को कैसे है! घूमते-घूमते उन्होंने बोला "नैनीवाल !भगवान अगर है भी तो कितना मूर्ख है , मोती समुंदर को देता है, भला मछलियों को कौन सा गहना पहनना होता है। सोंचो नैनीवाल ! अगर इस गुफा और इन आदिमानवों को हमने दुनिया के सामने ला दिया तो किस्मत खुल जाएगी हमारी। समंदर से मोती निकालने का वक्त आ गया है नैनीवाल । ये इनके खाने की हांडी है इसमें बेहोशी की दवा मिला देते हैं , फिर इन्हें पकड़कर लैब में अच्छे से शोध करेंगे इनपर।" "शर्म नहीं आती तुमलोग को ,जिन्होंने अभी जान बचाई उन्हीं के खिलाफ ही षड्यंत्र करने लगे " डॉ. संथाल गुस्से में लाल हो उठे। "तुम बात-बात पर भावुक को जाते हो मीणा , पर विज्ञान भावनाओं से नहीं शोध से चलता है । वो लोग भी तो अपने से कमजोर जानवरों को ढूंढने गए हैं ताकि बलि देकर अपनी देवी को खुश कर सकें ,तो हम उनकी बलि देकर अपने देवता को क्यों खुश नहीं कर सकते । ऐसा मौका जिंदगी बार-बार नहीं देती" डॉ.नैनीवाल बोले। "तुमलोग किसी सगे नहीं हो सकते " ये कहते हुए डॉ. संथाल गुफ़ा से बाहर निकल गए।

दो हिरणों को पकड़ कर आदिमानव वापस लौटे। नगाड़े बजने लगे । हथियारों को धार लगाकर बलि वेदी पर रख दिया गया। तभी किसे के भय से चीखने की आवाजें आने लगी। सबने पीछे मुड़कर देखा तो अवाक रह गए। कुंडु और नैनीवाल के हाथ-पांव बँधे थे औऱ आदिमानवों का वेश बनाए संथाल मीणा उन्हें घसीटते हुए बलि वेदी के ओर ला रहे थे। सरदार के पास पहुँचकर घुटने टेके और बोले " देवी इनके कारण क्रुद्ध है , इन्होंने नदियों में पेशाब किया है इसलिए जंगल में आग लगी है , बलि से पहले तुम्हारे खाने की हांडी को भी जूठा कर दिया इसलिए हांडी भी फूट गयी है। इन मासूम हिरणों के बलि से देवी खुश नहीं होगी , इन दुष्टों का खून पीकर देवी का क्रोध शांत होगा।" जबतक सरदार कोई फैसला करता तबतक संथाल ने वेदी से हथियार उठाया और दोनों सिरों को धड़ से अलग कर दिया। संथाल के इस विकराल रूप को देखकर बाकी दल भय से कांप उठा। ऐसा लग रहा था मानो महादेव ने कालभैरव को तांडव का आदेश दिया हो ।आदिमानवों ने संथाल को पकड़ लिया । उन्हें वेदी के पास बैठाकर सरदार कुछ संकेत किये। डॉ. संथाल के आंखों से आंसू झरने लगे ,घुटने पर बैठकर सिर झुकाया जैसे किसी बात पर सहमति जताई हो। फिर अपने साथियों से मुखातिब होकर बोले " इनका कहना है कि उनके पापों की सजा उनको देवी देती , वो हमारे दल के सरदार थे इसलिए उन्हें मारकर जो पाप मैंने किया है उसके लिए इसी वेदी पर मेरी भी बलि दी जाएगी। पर तुमलोग डरना नहीं , कोई मूर्खता तो बिल्कुल मत करना , इस बलि के बाद ये तुम्हें नदी के पास छोड़ देंगे। कंपनी को कह देना की हम तीनों आग में झुलसकर मर गए ,ये कहानी किसी को मत बताना वरना लोग जंगल से और डरने लगेंगे।" सारा दल फफककर रोने लगा। संथाल ने संकेत दिया और सरदार ने एक झटके में सिर धड़ से अलग कर दिया। शरीर धड़ाम से जमीन पे गिर पड़ा और सर साथियों से आँख आखिरी बार आंख मिलाकर बोला "जिसे तुम जंगल कहते हो वो घर है हमारा , जंगल वो है जहां तुम रहते हो।"


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