ज़िन्दगी की डोर
By Dhriti Arya
ज़िन्दगी-ए-पहेली की दरख्वास्तें रहा था सुलझा,
ना जाने कैसे इस डोर में खुद को पाया उलझा !
इक भूल-भुलैया है यह ज़िन्दगानी, गुम-सा पाया है खुद को जहाँ,
डोर के जिस सीरे से शुरुवात की थी खुद को न जाने कैसे फिर पाया वहाँ !
लोगों को नकली मुस्कान दिखाते,
जिस बीच अंदर के तूफ़ान गढ़गढ़ाते,
जीवन की किताब के उस पन्ने पर ला खड़ा किया है, ए खुदा, तूने मुझे,
जहाँ वापिस मुड़कर उन खुशियों-भरे-लम्हों को ताँकने का रास्ता ना सूझे।
बस अब थाम ले तू उँगली मेरी, ए अल्लाह मेरे !
शार्गिद बना ले अपना कुछ यूँ कि गुनगान करता फिरूँ बस तेरे।
ये ज़िन्दगी की डोर और नहीं सुलझती, सुलझाना सिखा दे ना।लम्हें भाग रहे हैं, ज़रा ठहरना सिखा दे ना।
इस अथाह संसार में हाथ पकड़, ज़रा चलना सिखा दे ना।
By Dhriti Arya

This touched me...
The plea to God actually left me with a heart full of emotions and a mind full of thoughts...