ज़िंदगी हूं मैं
By Ritu Jain
मैंने नोटों की गड्डियों के सामने
किरदारों को बदलते देखा है..
फिर नोटों के आशियानों को,
धुंए में ढलते देखा है।
मैंने जज़्बातों का क़त्ल,
अपनों के हाथों देखा है..
फिर अपनों को,
अपने किए पर बेहद पछताते देखा है।
देखा है मैंने,
दिन को रात होते..
बादलों के आने पर,
सूरज और किरणों का साथ खोते।
देखा है हसना फूलों का,
कांटों के होते।
ज़िंदगी हूं मैं,
देखा है सब कुछ हसते हसते,
देखा है सब कुछ रोते रोते।।।
By Ritu Jain

Comments