ज़िंदगी — एक सड़ता हुआ घाव
By Kavayanjali Uttam Uppalwad
ज़िंदगी...
जैसे एक रिसता हुआ ज़ख़्म,
जहाँ मवाद में दबे हैं अधूरे सपने,
और कीड़े
जैसे बीते हुए लम्हों की भूखी यादें।
वो आदमी बैठा था
एक सड़ी टांग लिए,
मानो समय ने उसे चबाया हो,
और थूक दिया हो किसी गुमनाम मोड़ पर।
मुस्कुरा रहा था वो...
कैसी अजीब मुस्कान थी
ना राहत, ना सुख, ना दर्द,
बस एक पत्थर-सी शांति,
जो हद से ज़्यादा चुप रह चुकी हो।
उसके ज़ख़्म ने मुझसे कहा
"यही तो है जीवन,
जहाँ हसरतें कीड़ों की शक्ल में पलती हैं,
और हर साँस एक सड़न को ढोती है।"
हर चीख़ उस मांस में दबी थी,
हर आँसू वहाँ सूख चुका था।
ना कोई शिकायत,
ना कोई प्रार्थना
बस एक सन्नाटा,
जो सब कुछ कह चुका था।
वो ज़ख़्म जीवन था
अंधेरा, गंधाता, बेबस,
और वो मुस्कान...
जैसे कोई ठहाका हो,
जो मौत को भी हँसा दे।
By Kavayanjali Uttam Uppalwad

❤️❤️
Excellent👏
It's a really beautiful poem it transforms pain into raw, honest beauty. The way it portray darkness with such depth shows immense emotional strength.
Really amazing
Amazingly written....a powerful message conveyed with such beautiful words❤️✨